ओशो ऑडियो पुस्तक - प्रवचन: Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद – परमात्मा मझधार है (mp3)

 

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Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद

Track #2 of the Series, अध्यात्म उपनिषद – Adhyatma Upanishad

"पूछते हैं लोग, कहां खोजें परमात्मा को? पूछते हैं कि जो भीतर ही छिपा है, वह भूल कैसे गया है? पूछते हैं कि जो इतना करीब है कि हृदय की धड़कन भी उतनी करीब नहीं, श्वासें भी उतनी पास नहीं स्वयं के, वह भी बिछुड़ कैसे गया है? जो मैं स्वयं ही हूं, उससे भी विस्मृति कैसे हो गई है?
और उनका पूछना तर्कयुक्त मालूम पड़ता है। प्रतीत होता है, वे जो पूछते हैं, ठीक ही पूछते हैं। और लगता है कि होना नहीं चाहिए था ऐसा। जो मेरे भीतर ही छिपा है, उसे ही मैं नहीं जान पाता हूं! जो मैं ही हूं, वह भी अपरिचित रह जाता है! तो फिर परिचय किससे होगा? पहचान किससे होगी? ज्ञान किसका होगा? जब पास ही छूट जाता है हाथ से, तो दूर को हम कैसे पा सकेंगे!"
 
 
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और ओशो आगे कहते हैं:
"उनका पूछना तर्कयुक्त मालूम पड़ता है। प्रतीत होता है, वे जो पूछते हैं, ठीक ही पूछते हैं। और लगता है कि होना नहीं चाहिए था ऐसा। जो मेरे भीतर ही छिपा है, उसे ही मैं नहीं जान पाता हूं! जो मैं ही हूं, वह भी अपरिचित रह जाता है! तो फिर परिचय किससे होगा? पहचान किससे होगी? ज्ञान किसका होगा? जब पास ही छूट जाता है हाथ से, तो दूर को हम कैसे पा सकेंगे!""ऐसा नहीं कि वह आज पास हो गया हो, वह सदा से ही पास है, अनंत-अनंत काल से पास है। उससे क्षण भर को भी हमारा छूटना और दूर होना नहीं हुआ है। हम जहां भागें, वह हमारे साथ भागता है। हम जहां जाएं, वह हमारे साथ जाता है। नर्कों में भी वह हमारे साथ यात्रा करता है और स्वर्गों में भी। पाप में भी वह हमारे साथ उतना ही खड़ा होता है, जितना पुण्य में। यह कहना भी ठीक नहीं कि साथ खड़ा होता है, क्योंकि जो हमारे साथ होता है उससे भी थोड़ी दूरी होती है। हमारा होना और उसका होना एक ही बात है।
अगर यह सच है, तो इस जगत में बड़ा चमत्कार हो गया कि हम अपने को ही खो बैठे! जो असंभव मालूम पड़ता है, अपने को कैसे खोया जा सकता है! अपनी छाया तक को खोना मुश्किल है। हम अपनी आत्मा को खो बैठे हैं, यह कैसे हो सकता है!
पर यह हुआ है। उसके होने की घटना कैसे घटती है, वही इस सूत्र का सार है। इस सूत्र में प्रवेश करने के पहले इसके बुनियादी आधार समझ लें।
आंख की सीमा है, एक परिधि है। उससे ज्यादा दूर हो तो आंख नहीं देख पाती, उससे ज्यादा पास हो तो भी आंख नहीं देख पाती। आंख के देखने का एक विस्तार है। किसी चीज को आंख के बहुत पास ले आएं, फिर आंख नहीं देख पाएगी; बहुत दूर ले जाएं तो भी आंख नहीं देख पाएगी। तो एक क्षेत्र है जहां आंख देखती है। और इस क्षेत्र के उस पार या इस पार आंख अंधी हो जाती है। और आप तो इतने निकट हैं कि आंख के पास ही नहीं हैं, आंख के पीछे हैं। यही अड़चन है।
ऐसा समझें कि दर्पण के सामने खड़े हैं, तो एक खास दूरी से दर्पण पर ठीक प्रतिबिंब बनता है। अगर बहुत दूर चले जाएं तो फिर दर्पण पर प्रतिबिंब नहीं बनेगा। बहुत पास आ जाएं, कि आंख को दर्पण से ही लगा लें, तो प्रतिबिंब दिखाई नहीं पड़ेगा। लेकिन यहां मामला ऐसा है कि आप दर्पण के पीछे खड़े हैं; इसलिए दर्पण पर प्रतिबिंब बनने का कोई उपाय ही नहीं है।"
 

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