ओशो ऑडियो पुस्तक - प्रवचन: Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद – वासना का नाश ही मोक्ष है<br>sound dropout (mp3)

 

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Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद

Track #5 of the Series, अध्यात्म उपनिषद – Adhyatma Upanishad

"साधारणतः हम ऐसा सोचते नहीं। साधारणतः हम सोचते हैं, क्यों है दुख? क्यों है यह संसार का कष्ट? क्यों है यह आवागमन? क्यों यह अहंकार सताता है? कैसे इससे छुटकारा हो? निरंतर हमारे मन में यह बात चलती है, कैसे इससे छुटकारा हो? आप सबके मन में कभी न कभी यह प्रश्न उठता ही रहा होगा--अन्यथा यहां आना असंभव था--कैसे इससे छुटकारा हो?
लेकिन यह सूत्र आपको बड़ा निराश करेगा। क्योंकि यह सूत्र कहता है, छुटकारे का सवाल ही नहीं है। क्योंकि अहंकार ने आपको पकड़ा नहीं है; संसार ने आपको रोका नहीं है; जन्मों ने आपको बुलाया नहीं है; यह आपकी मर्जी है।
इसलिए यह पूछना गलत है कि कैसे छुटकारा हो, यही पूछना उचित है कि किस भांति, किस तरकीब से हमने इस सब दुख, उपद्रव को पकड़ रखा है। छुटकारे का सवाल ही नहीं उठाना चाहिए। सवाल यही होना चाहिए कि कौन सी है हमारी व्यवस्था, कौन सा है हमारा ढंग, कि हम दुख को पकड़ लेते हैं, कि हम दुख को पकड़ते ही चले जाते हैं, कि अपने ही हाथ से हम आरोपित करते चले जाते हैं--और नये संसार, और नये जन्म, और नये जीवन। वासना के नये-नये विस्तार, नये आकाश हम कैसे निर्मित करते चले जाते हैं--इसे ही समझना जरूरी है।"
 
 
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और ओशो आगे कहते हैं:
"इसके बहुत अंतर्निहित अर्थ होंगे। इसका एक अर्थ तो यह होगा कि मोक्ष कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है जो पाने को है। संसार जरूर खोने को है, लेकिन मोक्ष पाने को नहीं है। अगर आप संसार को छोड़ने में राजी हो जाएं, तो मोक्ष पाया ही हुआ है। इसका यह अर्थ हुआ कि मुक्त तो आप हैं ही, बड़ी तरकीब से आप बंधन में पड़े हैं।
कभी अगर देखा हो, तोतों को पकड़ते हैं जंगलों में, रस्सी बांध देते हैं। तोता रस्सी पर बैठता है, वजन से उलटा लटक जाता है; रस्सी घूम जाती है। फिर तोता समझता है कि पकड़े गए। उलटा लटका तोता समझता है कि पकड़े गए, बुरी तरह फंसे! पैर फंस गया, अब निकलना मुश्किल है।
जोर से रस्सी को तोता ही पकड़े होता है, रस्सी बिलकुल पकड़े नहीं होती। लेकिन तोते का मानना भी ठीक है कि जिस रस्सी ने उलटा दिया, लटका दिया, जरूर पकड़े गए होंगे! वह लटका रहता है! वह हर तरह की कोशिश करता है कि सीधा हो जाऊं तो उड़ जाऊं, लेकिन सीधा वह हो नहीं सकता। सीधा होने का कोई उपाय नहीं है। रस्सी पर वह सीधा नहीं बैठ सकता। रस्सी है पतली और तोता है वजनी। वह कितने ही उपाय करे, बार-बार चक्कर खाकर नीचे लटक जाएगा। जितने उपाय करेगा, उतना भरोसा मजबूत होता जाएगा कि अब छूटना मुश्किल है।
अगर वह चाहे तो उसी क्षण छोड़ कर उड़ सकता है, लेकिन पहले वह सीधे होने की कोशिश करता है। उलटा ही अगर छोड़ दे तो अभी उड़ सकता है, क्योंकि रस्सी ने उसे पकड़ा नहीं है। लेकिन तोता कभी उलटा उड़ा नहीं है; जब भी उड़ा है सीधा बैठा है, तब उड़ा है। उड़ने की उसे एक ही तरकीब पता है कि पहले दो पैर पर सीधे बैठ जाओ, फिर उड़ जाओ। वह सोचता है कि उड़ने का कोई अनिवार्य संबंध दो पैर पर सीधे बैठने से है।
उलटा लटका हुआ तोता कैसे समझे कि मैं भी उड़ सकता हूं, अभी और यहीं! और कहीं भी मैं पकड़ा नहीं गया हूं। लेकिन उलटा लटके होने की वजह से यह भी उसे डर लगता है कि अगर छूट जाऊं, तो जमीन पर गिरूं, हड्डी-पसली चकनाचूर हो जाए! तो जोर से उस रस्सी को पकड़ता है। कितनी ही देर बाद उसको पकड़ने वाला आए, उसे पाएगा वहीं; वह वहीं लटका हुआ मिलेगा।
करीब-करीब आदमी की चेतना की स्थिति ऐसी है। किसी ने भी आपको पकड़ा नहीं है। किसको इसमें रस आएगा, आपको पकड़ने में! और इस जगत को कोई उत्सुकता नहीं है कि आपको पकड़े रखे। प्रयोजन भी क्या है? आपको पकड़ रखने से जगत को मिलता भी क्या है?
नहीं, किसी की कोई उत्सुकता आपको पकड़ रखने में नहीं है। आप पकड़े गए हैं, अपने ही द्वारा। कुछ भ्रांतियां हैं, जो आपको खयाल देती हैं कि मैं पकड़ा गया हूं। और बड़ी भ्रांति तो यही है कि आप अपने को इतना मूल्यवान समझते हैं कि सारा जगत आपको पकड़ने को उत्सुक है। यह भी अहंकार है कि सारे दुख आपकी तरफ ही चले आ रहे हैं। इतने दुख! इतना ध्यान देते हैं आप पर! सारे नर्क आपके लिए निर्मित किए गए हैं! आपके लिए! आप केंद्र में बैठे हैं! जैसे यह सारे जगत की व्यवस्था आपके लिए चल रही है। और आप केवल रस्सी में लटके हुए एक तोते हैं!
पर यह भ्रांति होने के ठीक वैसे ही कारण हैं, जैसे तोते को हो जाते हैं।
आदमी का जैसे ही जन्म होता है, कई दुर्घटनाएं घट जाती हैं। अनिवार्य हैं, इसलिए घट जाती हैं। छोटा बच्चा पैदा होता है, तो आदमी का बच्चा बिलकुल असहाय पैदा होता है। ऐसा किसी पशु का बच्चा असहाय पैदा नहीं होता। जानवरों के बच्चे पैदा होते हैं और पैदा होते ही दौड़ने लगते हैं। पशुओं के बच्चे, पक्षियों के बच्चे पैदा होते हैं, पैदा होते ही अपने भोजन की तलाश में निकल जाते हैं। आपका बच्चा पैदा होगा, पच्चीस साल लगेंगे, तब भोजन की तलाश पर निकल पाएगा! पच्चीस साल!"
 

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