ओशो ऑडियो पुस्तक - प्रवचन: Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद – जीवन एक अवसर है (mp3)

 

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Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद

“जीवन में जो भी पाने योग्य है, वह जीवन में ही पाया जा सकता है। लेकिन बहुत लोग मृत्यु के पार की प्रतीक्षा करते रहते हैं। बहुत लोग सोचते हैं कि देह में, जीवन में, संसार में रह कर कैसे पाया जा सकता है सत्य को, ब्रह्म को, मुक्ति को! लेकिन जो जीवन में नहीं पाया जा सकता वह कभी भी नहीं पाया जा सकता है। जीवन तो एक अवसर है पाने का, चाहे पत्थर जुटाने में समाप्त कर दें और चाहे परमात्मा को पाने में। जीवन तो बिलकुल तटस्थ अवसर है। जीवन आपसे कहता नहीं, क्या पाएं। कंकड़-पत्थर बीनें, व्यर्थ की चीजें संगृहीत करें, अहंकार को बढ़ाने में, अहंकार को फुलाने में समाप्त कर दें, तो जीवन रोकेगा नहीं कि मत करो ऐसा। और चाहें तो सत्य को, स्वयं को, जीवन की जो आत्यंतिक गहराई है उसको पाने में लगा दें; तो भी जीवन बाधा नहीं डालेगा कि मत करें ऐसा। जीवन सिर्फ अवसर है तटस्थ, जो भी उपयोग करना चाहें कर लें।“
 
 
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और ओशो आगे कहते हैं:
"लेकिन बहुत लोगों ने अपने को धोखा देने का इंतजाम कर रखा है। वे सोचते हैं, जीवन तो है संसार के लिए। ऐसे विभाजन उन्होंने बना लिए हैं। जीवन तो है भोग के लिए। तो फिर मृत्यु ही बच जाती है योग के लिए। लेकिन मृत्यु अवसर नहीं है।
इसे थोड़ा ठीक से समझ लें। मृत्यु है अवसर की समाप्ति। मृत्यु का अर्थ क्या होता है? मृत्यु का अर्थ है कि अब कोई अवसर न बचा। जीवन है अवसर, मृत्यु है अवसर की समाप्ति। इसलिए मृत्यु से तो कुछ भी पाया नहीं जा सकता है; पाने के लिए अवसर चाहिए।
हमने बांट रखा है। हम कहते हैं, जीवन है भोग के लिए। फिर जब जीवन रिक्त हो जाएगा, तब...तब योग। हमने ऐसी कहानियां गढ़ रखी हैं कि मरते आदमी को कान में--जब कि उसे सुनाई भी नहीं पड़ेगा, क्योंकि जिंदों को सुनाई नहीं पड़ता, तो मुर्दों को कैसे सुनाई पड़ता होगा--मरते हुए आदमी के कान में गायत्री पढ़ दो, कि प्रभु का नाम ले दो, कि राम-राम की रटन लगा दो। जो जिंदगी भर न सुन पाया गायत्री, सुना तो भी नहीं सुन पाया, सुना तो भी समझ नहीं पाया, वह मरते वक्त, जब कि इंद्रियां जवाब दे रही होंगी--आंखें देखेंगी नहीं, कान सुनेंगे नहीं, हाथ छुएंगे नहीं--जब कि प्राण लीन हो रहे होंगे बीज में, तब वह गायत्री सुन पाएगा?
वह तो नहीं सुन पाएगा। लेकिन फिर लोग क्यों सुनाए चले जा रहे हैं? इसमें भी राज है। वह मरता हुआ आदमी कुछ नहीं सुन पाता, लेकिन जो जिंदा सुना रहे हैं, उनको यह आश्वासन बना रहता है कि मरते वक्त कोई हमें भी सुना देगा और काम हो जाएगा!
उन्होंने कहानियां गढ़ रखी हैं! इन बेईमानों ने कहानियां गढ़ रखी हैं। वे कहते हैं, एक आदमी मर रहा था, उसके बेटे का नाम नारायण था। उसने जोर से पुकारा, नारायण! वह नारायण जो ऊपर हैं, धोखे में आ गए! वह अपने बेटे को अपनी तरकीबें बताने जा रहा था कि ब्लैक मार्केट कैसे करना! दूसरा खाता कैसे रखना! वह यह समझाने के लिए बुला रहा था। वह स्वर्ग पहुंच गया, बैकुंठ! वह खुद भी चौंका कि यहां कैसे आ गए! लेकिन नारायण का नाम जो ले लिया था!
ऐसे सस्ते काम नहीं चलेगा। और जो नारायण ऐसे धोखे में आता हो, समझना वह भी धोखे का ही नारायण होगा। जीवन में धोखे नहीं चलते, अपने मन को समझाने की बात और है।
मृत्यु है अवसर की समाप्ति; इस अर्थ को ठीक से समझ लें। मृत्यु कोई अवसर नहीं है और, जिसमें आप कुछ कर पाएंगे। मृत्यु है सब अवसर का नष्ट हो जाना; आप कुछ भी न कर पाएंगे। करने का कोई उपाय ही मृत्यु में नहीं है। करने का अर्थ है जीवन। इसलिए जो भी करना हो, वह जीवन में ही कर लेने का है।"
 

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