ओशो ऑडियो पुस्तक - प्रवचन: Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद – चैतन्य का दर्पण (mp3)

 

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Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद

Track #7 of the Series, अध्यात्म उपनिषद – Adhyatma Upanishad

"एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल को इस सूत्र में उठाया गया है। निरंतर आदमी के मन में यह सवाल उठता रहा है--सदियों से, सनातन से--कि जिस संसार में हम उलझे हैं, जिस संसार में हम दुख और पीड़ा और संताप से घिर गए हैं, उससे मुक्ति कैसे हो? और यह संसार, जिसमें हम घिर गए हैं, वस्तुतः क्या है? यह अंधकार, जिसमें हम डूब गए और खो गए हैं, इसका स्वरूप क्या है? क्योंकि बिना इसके स्वरूप को जाने इससे छूटने का कोई उपाय नहीं हो सकता। जिससे छूटना हो, उसे ठीक से जान ही लेना पड़ेगा। अज्ञान में ही बंधन निर्मित होते हैं। तो अगर खोलना हो बंधनों को, तो ज्ञान से ही उनकी गांठ खुल सकती है।
ऐसा हुआ एक दिन कि बुद्ध सुबह-सुबह अपने भिक्षुओं के बीच आए, तो हाथ में ले रखा था एक रूमाल रेशम का। चकित हुए भिक्षु! क्योंकि कभी वे कुछ भी लेकर हाथ में भिक्षुओं के बीच बोलने नहीं आते थे। फिर बैठ गए सामने और उस रूमाल पर उन्होंने एक गांठ बांधी, दूसरी गांठ बांधी, पांच गांठें बांधीं। और फिर पूछा भिक्षुओं से कि यह रूमाल मैं लेकर आया था, तब इसमें कोई गांठ न थी, अब इसमें पांच गांठें हैं; पूछता हूं तुमसे, यह रूमाल बदल गया या वही है?"
 
 
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और ओशो आगे कहते हैं:
"निश्चित ही कठिनाई हुई होगी। क्योंकि यह कहना भी गलत है कि रूमाल बदल गया। क्योंकि रूमाल बिलकुल वही है। गांठ लगने से रूमाल के स्वभाव में रत्ती भर भी अंतर नहीं पड़ा। जितना था, जैसा था, वैसा ही है रूमाल अब भी। लेकिन यह कहना भी उचित नहीं है कि रूमाल बिलकुल नहीं बदला; क्योंकि तब रूमाल खुला था, अब गांठों से घिरा है। इतनी बदलाहट जरूर हो गई है।
तो एक भिक्षु ने खड़े होकर कहा, बड़ा कठिन सवाल पूछते हैं! रूमाल लगभग बदल गया है!
इसे थोड़ा समझ लें, क्योंकि यह शब्द जल्दी ही इस सूत्र में आएगा, और तब समझना जरूरी हो जाएगा। लगभग बदल गया है! बदला भी नहीं है, और बदल भी गया है। बदला नहीं है, अगर हम इसके स्वरूप को देखें। और बदल गया है, अगर हम इसके शरीर को देखें। नहीं बदला है, अगर इसकी आत्मा हम समझें। बदल गया है, अगर इसकी देह को हम देखें। नहीं बदला है भीतर से, लेकिन बाहर से गांठ लग गई है और बदलाहट हो गई है। आकार बदल गया है, आकृति बदल गई है। नहीं बदला है, अगर इसके परम स्वभाव को हम समझें; लेकिन बदल गया है, अगर इसके व्यवहार को हम देखें। क्योंकि जो रूमाल खुला था, वह काम में आ सकता था; जिस रूमाल में पांच गांठें लग गईं, वह काम में भी नहीं आ सकता। वह रूमाल भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि रूमाल तो किसी उपयोगिता का नाम था।
ध्यान रहे, हम जब किसी चीज को कोई शब्द देते हैं तो वह उपयोगिता का नाम होता है। मजबूरी है, कठिनाई होगी भाषा में, इसलिए जब उपयोगिता नहीं होती है, तब भी हम वही नाम देते हैं।
जैसे समझें, पंखा आप करते हैं गर्मी में, तो आप कहते हैं पंखा। लेकिन जब पंखा रखा हो, तब उसको पंखा नहीं कहना चाहिए। पंखा का मतलब हुआ जिससे हवा की जा रही है; जो पंख का काम कर रहा है। लेकिन जब रखा है तब तो हवा नहीं की जा रही है। तो उसे पंखा नहीं कहना चाहिए।
पैर वे हैं जिनसे आप चलते हैं। लेकिन जब आप नहीं चलते हैं, तब उन्हें पैर कहना नहीं चाहिए। फंक्शनल, उनका क्रिया का नाम होना चाहिए। लेकिन कठिन हो जाएगी भाषा। चलते पैर के लिए अलग नाम, बैठते पैर के लिए अलग नाम, तो बहुत मुश्किल होगा। इसलिए काम चलाते हैं।
तो पंखे के दो अर्थ होते हैं, पंखा वह जिससे हवा की जाती है या जिससे हवा की जा सकती है; दोनों अर्थों में हम प्रयोग करते हैं। जिससे हवा हो सकती है, जिसमें संभावना छिपी है।
रूमाल का कोई उपयोग है, उसमें कुछ बांधा जा सकता है। लेकिन जो रूमाल खुद ही बंधा हो, उसमें अब कुछ नहीं बांधा जा सकता।
तो बुद्ध ने कहा, एक और सवाल मुझे पूछना है, और वह यह कि मैं इस रूमाल को खोलना चाहता हूं तो क्या करूं?
और ऐसा कह कर बुद्ध ने रूमाल के दोनों छोर पकड़ कर जोर से खींचना शुरू कर दिया। गांठें और छोटी हो गईं; और बारीक होकर कस गईं।
एक भिक्षु ने चिल्ला कर कहा, क्षमा करें! जो आप कर रहे हैं, उससे तो रूमाल और बंध जाएगा और खोलना कठिन हो जाएगा!
तो बुद्ध ने कहा, एक बात जाहिर हो गई कि कुछ भी करने से रूमाल नहीं खुल जाएगा। मैं कुछ कर रहा हूं। लेकिन तुम कहते हो इस करने से रूमाल और बंधता जा रहा है। तो क्या करने से रूमाल खुलेगा?
तब एक भिक्षु ने कहा, पहले जानना होगा कि गठान कैसे बंधी है। क्योंकि जब तक गांठ के स्वरूप को न समझा जा सके, तब तक उसे खोला नहीं जा सकता। तो पहले देखना होगा कि गांठ बंधी कैसे है। जो बंधने का ढंग है, उसके विपरीत ही खुलने का ढंग होता है। और जब तक हमें पता न हो कि बंधने का ढंग क्या है, तब तक ना-कुछ करना बेहतर है बजाय कुछ करने के। क्योंकि करने से जाल और उलझ सकता है; गांठ और मुश्किल हो सकती है; सुलझाना और कठिन हो सकता है।"
 

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