ओशो ऑडियो पुस्तक - प्रवचन: Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद – वैराग्य का फल ज्ञान है (mp3)

 

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Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद

Track #8 of the Series, Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद

"इस सूत्र में कुछ बहुत महत्वपूर्ण बातें हैं। पहली:
‘समस्त भेद और समस्त विकल्पों का मूल चित्त है। अगर चित्त न हो तो कोई भेद नहीं, इसलिए परमात्मा में तू चित्त को एकाग्र कर दे।’
चित्त और एकाग्रता, दो बातों के संबंध में गहरे से समझ लेना जरूरी है। चित्त जीवन की अनिवार्यता है। चित्त का अर्थ है, विचारों का प्रवाह। पूरे समय आपके भीतर चित्त बह रहा है।
चित्त कोई वस्तु नहीं है; पहली बात खयाल ले लें। चित्त है प्रवाह, वस्तु नहीं। और फर्क कीमती है। एक पत्थर पड़ा है, वह एक वस्तु है; एक झरना बह रहा है, वह एक प्रवाह है। जो चीज पड़ी है, वह थिर है; जो बह रही है, वह प्रतिपल बदल रही है। चित्त वस्तु नहीं है, चित्त प्रवाह है। इसलिए चित्त प्रतिपल बदल रहा है। एक क्षण भी वही नहीं है, जो क्षण भर पहले था। जैसे नदी बदलती जा रही है।"
 
 
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और ओशो आगे कहते हैं:
"हेराक्लतु ने कहा है, एक ही नदी में दुबारा नहीं उतरा जा सकता। क्योंकि जब आप दुबारा उतरने जाएंगे तो जिस पानी में पहली बार उतरे थे, वह न मालूम कहां जा चुका। ऐसे ही एक ही चित्त को भी दुबारा नहीं पाया जा सकता; जो बह गया, वह बह गया। और पूरे समय भीतर धारा बह रही है।
इस बहती धारा के पीछे खड़े होकर हम देख रहे हैं जगत को। तो चित्त की छाया हर चीज पर पड़ती है। और बदलता हुआ चित्त, खंड-खंड हजार टुकड़ों में टूटा हुआ चित्त, सारे जगत को भी तोड़ देता है।
तो पहली बात, चित्त एक प्रवाह है, बदलता हुआ। इसलिए चित्त के द्वारा उसे नहीं जाना जा सकता जो कभी बदलता नहीं है। जिसके द्वारा हम जान रहे हैं, अगर वह बदलता हुआ हो, तो हम उसे नहीं जान सकते जो कभी बदलता नहीं है। बदलती हुई चीज के माध्यम से हम जो भी जानेंगे वह भी बदलता हुआ ही दिखाई पड़ेगा।
जैसे आपकी आंख पर एक चश्मा हो, और उस चश्मे का रंग बदल रहा हो--लाल से हरा हो जाए, हरे से पीला हो जाए, पीले से सफेद हो जाए--आपके चश्मे का रंग बदल रहा हो, तो उसके साथ ही बाहर का जो जगत है, उसका रंग बदलता चला जाएगा; क्योंकि जिस माध्यम से आप देख रहे हैं, वह आरोपित हो रहा है।
मन आपका बदल रहा है, प्रतिपल। इसी कारण मन से हम केवल उसी को जान सकते हैं, जो बदल रहा है; मन से उसे नहीं जान सकते, जो कभी नहीं बदलता है। और इस जीवन का जो परम गुह्य सत्य है, वह अपरिवर्तनीय है; वह शाश्वत है, वह कभी बदलता नहीं। इसलिए चित्त उसे जानने का मार्ग नहीं है।
जगत की जो पदार्थ सत्ता है, वह बदलती है; वह मन की तरह ही बदलती है। इसलिए मन से जगत के पदार्थ को जाना जा सकता है, लेकिन जगत में छिपे परमात्मा को नहीं जाना जा सकता। जैसे विज्ञान मन का उपयोग करता है, चित्त का उपयोग करता है खोज के लिए; विज्ञान मन के ही माध्यम से जगत की खोज करता है। और इसलिए विज्ञान कभी भी नहीं कह पाएगा कि ईश्वर है। विज्ञान सदा ही कहेगा, पदार्थ है। परमात्मा की कोई प्रतीति विज्ञान में उपलब्ध नहीं होगी। नहीं इसलिए कि परमात्मा नहीं है, बल्कि इसलिए कि विज्ञान जिस माध्यम का उपयोग कर रहा है, वह माध्यम केवल परिवर्तनशील को ही जान पाता है; वह माध्यम अपरिवर्तनीय को नहीं जान पाएगा।
ऐसा समझें कि संगीत चल रहा हो, और आप आंख से सुनने की कोशिश करें, तो आप कभी भी न सुन पाएंगे; संगीत का पता ही नहीं चलेगा। आंख देख सकती है, इसलिए आंख से रूप का पता चल सकता है। आंख सुन नहीं सकती, इसलिए ध्वनि का कोई पता नहीं चल सकता है। कान सुन सकते हैं, देख नहीं सकते। लेकिन कान से अगर कोई देखने की कोशिश करे, तो वह कहेगा, जगत में कोई रूप है ही नहीं। कान को तो ध्वनि ही पकड़ में आती है। माध्यम जो पकड़ सकता है, उसी को जान सकता है।"