ओशो ऑडियो पुस्तक - प्रवचन: Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद – ब्रह्म की छाया संसार है (mp3)

 

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Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद

Track #9 of the Series, अध्यात्म उपनिषद – Adhyatma Upanishad

"ईश्वर को पुकारा गया है बहुत नामों से। अनेक-अनेक संबंध मनुष्य ने ईश्वर के साथ स्थापित किए हैं। कहीं ईश्वर को पिता, कहीं माता, कहीं प्रेमी, कहीं प्रेयसी भी, कहीं मित्र, कहीं कुछ और, ऐसे बहुत-बहुत संबंध आदमी ने परम सत्य के साथ स्थापित करने की कोशिश की है। लेकिन उपनिषद अकेले हैं इस पूरी पृथ्वी पर, जिन्होंने परमात्मा को सिर्फ कहा है: दैट; वह; तत्‌। कोई संबंध स्थापित नहीं किया।
इसे थोड़ा समझ लेना चाहिए। यह बड़ी गहरी अंतर्दृष्टि है। परमात्मा को हम प्रेम से पिता, माता पुकार सकते हैं, लेकिन उस पुकारने में समझ कम और नासमझी ज्यादा है। परमात्मा से हम कोई भी संबंध स्थापित करें, वह नासमझी का है। क्यों? क्योंकि संबंध में एक अनिवार्य बात है कि दो की मौजूदगी होनी ही चाहिए; संबंध बनता ही दो से है। मैं हूं, मेरे पिता हैं, तो दोनों का होना जरूरी है। मैं हूं या मेरी मां है, तो दो का होना जरूरी है। परमात्मा के साथ ऐसा कोई भी संबंध सही नहीं है, ऐसा कोई भी संबंध संभव नहीं है, जिसमें हम दो रह कर संबंधित हो पाएं। उसके साथ तो खोकर ही संबंधित हुआ जा सकता है; अलग रह कर संबंधित नहीं हुआ जा सकता।"
 
 
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और ओशो आगे कहते हैं:
"इस जगत के सारे संबंध अलग रह कर ही संबंध होते हैं। परमात्मा के साथ जो संबंध है, वह लीन होकर, खोकर, एक होकर स्थापित होता है। यह बड़ी उलझन की बात है। संबंध के लिए दो का होना जरूरी है। इसलिए हम यह भी कह सकते हैं कि परमात्मा से कोई संबंध कभी स्थापित नहीं हो सकता। अगर संबंध के लिए दो का होना जरूरी है, तो परमात्मा से फिर कोई संबंध स्थापित नहीं हो सकता। क्योंकि परमात्मा से तो मिलन ही तब होता है जब दो मिट जाते हैं और एक रह जाता है।
कबीर ने कहा है: खोजने निकला था, बहुत खोज की और तुझे नहीं पाया। खोजते-खोजते खुद खो गया, तब तू मिला। वह जो खोजने निकला था, वह जब तक था, तब तक तुझसे कोई मिलना न हुआ; और जब खोजते-खोजते तू तो न मिला, लेकिन खोजने वाला खो गया, तब तुझसे मिलना हुआ।
इसका तो मतलब यह हुआ कि मनुष्य का परमात्मा से मिलना कभी भी नहीं होता है। क्योंकि जब तक मनुष्य रहता है, परमात्मा नहीं होता। और जब परमात्मा होता है तो मनुष्य नहीं होता। दोनों का मिलना कभी नहीं होता। इसलिए इस जगत के जितने संबंध हैं, उनमें से कोई भी संबंध हम परमात्मा पर लागू करके भूल करते हैं। पिता से मिला जा सकता है बिना मिटे; मिटना कोई शर्त नहीं है। माता से मिला जा सकता है बिना मिटे, मिटना कोई शर्त नहीं है। लेकिन परमात्मा से मिलने की बुनियादी शर्त है मिट जाना। संबंध होता है दो के बीच, और परमात्मा से संबंध होता है तब, जब दो नहीं होते। इसलिए संबंध बिलकुल उलटा है।
उपनिषदों ने परमात्मा नहीं कहा, पिता नहीं कहा, माता नहीं कहा, कोई मानवीय संबंध स्थापित नहीं किए। सब मानवीय संबंध स्थापित करना, समाजशास्त्री कहते हैं, एंथ्रोपोसेन्ट्रिक है, मानव-केंद्रित है। आदमी अपने को ही थोपता चला जाता है हर चीज में।
इस एंथ्रोपोसेन्ट्रिक, यह मानव-केंद्रित जो दृष्टि है, इसे थोड़ा समझ लेना चाहिए, क्योंकि आधुनिक मनसशास्त्र, समाजशास्त्र इस शब्द से बहुत प्रभावित हैं और इसका बड़ा मूल्य स्वीकार करते हैं। आदमी जो कुछ भी देखता है, उसमें आदमी को आरोपित कर लेता है। चांद पर बादल घिरे हों, तो हम कहते हैं, चांद का मुखड़ा घूंघट में छिपा है। न वहां कोई मुखड़ा है और न वहां कोई घूंघट है। पर आदमी अपने अनुभव को, स्वाभाविक, स्वाभाविक, स्वभावतः, अपने अनुभव को आरोपित कर लेता है; हर चीज को! चंद्रमा पर ग्रहण लगा हो, तो हम कहते हैं, राहू-केतु ने ग्रस लिया, दुश्मन चंद्र के उसके पीछे पड़े हैं।
आदमी आदमी की ही भाषा में सोच सकता है। इसलिए हम अपने चारों तरफ जो भी देखते हैं, उसमें हम अपने को आरोपित करते चले जाते हैं। पृथ्वी को हम माता कहते हैं; आरोपण है। आकाश को हम पिता कहते हैं; आरोपण है। और हम खोजने जाएंगे तो आदमी ने जो-जो संबंध निर्धारित किए हैं अपने जगत से, उन सब में अपने ही संबंधों को स्थापित कर दिया है।"
 

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