ओशो ऑडियो पुस्तक - प्रवचन: Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद – सत्य की यात्रा के चार चरण (mp3)

 

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Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद

Track #10 of the Series, Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद

"चार शब्दों का प्रयोग हुआ है। एक-एक शब्द अपने आप में एक-एक जगत है। वे चार शब्द हैं: श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि। इन चार शब्दों में सत्य की सारी यात्रा समाहित हो जाती है। ये चार चरण जो सम्यकरूपेण, ठीक-ठीक पूरा कर ले, उसे कुछ और करने को शेष नहीं रह जाता है। इन चार शब्दों के आस-पास ही समस्त साधना विकसित हुई है। इसलिए एक-एक शब्द को बारीकी से, गहराई से, सूक्ष्मता से समझ लेना उपयोगी है।
पहला शब्द है, श्रवण।
श्रवण का अर्थ मात्र सुनना नहीं है। सुनते हम सभी हैं। कान होना काफी है सुनने के लिए। सुनना एक यांत्रिक घटना है। ध्वनि हुई, कान पर आवाज पड़ी, आपने सुना। श्रवण इतना ही नहीं है। श्रवण का अर्थ है, सिर्फ कान से न सुना गया हो, भीतर जो चैतन्य है उस तक भी गूंज पहुंच जाए।"
 
 
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और ओशो आगे कहते हैं:
"इसे थोड़ा समझ लें।
आप रास्ते से गुजर रहे हैं; आपके घर में आग लग गई है, आप भाग रहे हैं। रास्ते पर कोई नमस्कार करता है। कान सुनेंगे, आप नहीं सुनेंगे। दूसरे दिन आप बता भी न सकेंगे कि किसी ने रास्ते पर नमस्कार किया था। घर में आग लगी थी, रास्ते पर कोई गीत गाता हो, कान सुनेंगे, आप नहीं सुनेंगे।
कान का सुनना आपका सुनना नहीं है। जरूरी नहीं है कि कान ने सुना हो तो आपने भी सुना हो। कान सुनने के लिए जरूरी है, काफी नहीं है; आवश्यक है, पर्याप्त नहीं है। कुछ और भी भीतर चाहिए। जब आपके घर में आग लगी होती है, तो नमस्कार किया गया सुनाई नहीं पड़ता; क्यों? कान का यंत्र तो वैसा का ही वैसा है। लेकिन भीतर ध्यान कान के साथ टूट गया है। ध्यान, मकान में आग लगी है, वहां चला गया है। कान सुन रहा है, लेकिन कान ने जो सुना है, उसे चैतन्य तक पहुंचाने के लिए ध्यान का जो सेतु चाहिए, वह नहीं है। वह सेतु हट गया है। वह वहां लगा है, जहां मकान में आग लगी है। इसलिए कान सुनते हैं, आप नहीं सुन पाते। आप और कान के बीच में जो संबंध है, वह टूट गया है।
श्रवण का अर्थ है, कान भी वहां हों और आप भी वहां हों। तो श्रवण घटित होता है। कठिन बात है। कान के साथ होना साधना की बात है। श्रवण का अर्थ है कि जब आप सुनते हों तो आपकी सारी चेतना कान हो जाए; सुनना ही रह जाए, बाकी कुछ भी न हो; भीतर कोई विचार न चले। क्योंकि भीतर अगर विचार चलता है, तो आपका ध्यान विचार पर चला जाता है, कान से हट जाता है।
ध्यान बड़ी सूक्ष्म, नाजुक चीज है। जरा सा विचार भीतर चल रहा हो, तो ध्यान वहां चला जाता है। पैर में चींटी काट रही हो, आप मुझे सुन रहे हैं और आपको पैर में चींटी काट रही हो--मकान में आग लगना जरूरी नहीं है, पैर में चींटी काट रही हो--तो जितनी देर के लिए आपको पता चलता है कि पैर में चींटी काट रही है, उतनी देर तक श्रवण खो जाता है; सुनना होता है। ध्यान हट गया।
ध्यान की और तकलीफ है कि ध्यान एक साथ दो चीजों पर नहीं हो सकता, एक चीज पर एकबारगी होता है। जब दूसरी चीज पर होता है, एक से तत्काल हट जाता है। आप ऐसा कर सकते हैं कि छलांग लगा सकते हैं। हम छलांग लगाते रहते हैं। पैर में चींटी ने काटा, ध्यान वहां गया; फिर वापस ध्यान लौटा, सुना। खुजली आ गई, ध्यान वहां गया; फिर सुना। तो बीच-बीच में जब ध्यान हट जाता है, तो गैप, अंतराल पड़ जाते हैं श्रवण में।
और इसलिए जो आप सुनते हैं, उसमें से बहुत अर्थ नहीं निकल पाता, क्योंकि उसमें बहुत कुछ खो जाता है। और कई बार जो अर्थ आप निकालते हैं, वह आपका ही होता है फिर, क्योंकि उसमें बहुत कुछ खो गया है। फिर जोड़ कर आप जो सोच लेते हैं, वह आपका ही है।"
 

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