ओशो ऑडियो पुस्तक - प्रवचन: Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद – धर्म-मेघ समाधि (mp3)

 

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Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद

Track #11 of the Series, Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद

"श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि, इन चार चरणों के संबंध में सुबह हमने बात की। समाधि संसार का अंत और सत्य का प्रारंभ है। समाधि मन की मृत्यु और आत्मा का जन्म है। इस ओर से देखें तो समाधि अंतिम चरण है, उस ओर से देखें तो समाधि पहला चरण है।
श्रवण, मनन, निदिध्यासन, इनसे मन क्षीण होता चलता है, लीन होता चलता है; समाधि में पूरी तरह लीन हो जाता है। और जहां मन पूरी तरह लीन हो जाता है, वहां उसका अनुभव शुरू होता है, जो वस्तुतः हम हैं। इस समाधि के संबंध में यह सूत्र है। और इस सूत्र में कुछ बहुत गहरी बातें हैं।"
 
 
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और ओशो आगे कहते हैं:
"यह पहली बात काफी खयाल से समझ लें। जो साधना में लगे हैं, उनके लिए, आज नहीं कल, काम की होगी।
समाधि में कोई अनुभव नहीं होता। सुन कर कठिनाई होगी। समाधि में कोई अनुभव हो भी नहीं सकता। और समाधि परम अनुभव भी है। यह विरोधाभासी वक्तव्य है, उलटा दिखाई पड़ता है। लेकिन कुछ कारण से उलटा दिखाई पड़ता है। समाधि में परम आनंद का अनुभव होता है, लेकिन समाधि में डूबे हुए साधक को कोई भी पता नहीं चलता; क्योंकि साधक और आनंद एक हो गए होते हैं, पता चलने के लिए दूरी नहीं रहती।
हमें पता उन्हीं चीजों का चलता है जिनसे हम भिन्न हैं, अलग हैं, दूर हैं। समाधि में आनंद की जो प्रतीति होती है, जो अनुभव होता है, उसका कोई पता समाधि में नहीं चलता। जब साधक समाधि से वापस लौटता है, तब अनुमान करता है कि आनंद हुआ था; पीछे से स्मरण करता है कि परम आनंद हुआ था, अमृत बरसा था; जीए थे किसी और ढंग में और जीवन की कोई गहन स्थिति अनुभव की थी--यह पीछे से स्मरण आता है, जब मन लौट आता है।
इसे हम ऐसा समझें कि श्रवण, मनन, निदिध्यासन, समाधि, ये चार सीढ़ियां हैं। इनसे साधक समाधि के द्वार पर जाकर अनुभव करता है। अगर समाधि में ही साधक रह जाए और वापस न लौट सके, तो अपने अनुभव को कभी भी न कह सकेगा। अपने अनुभव को बताने का फिर कोई उपाय नहीं है। लेकिन जो साधक समाधि को उपलब्ध हो जाता है, वह वही का वही वापस कभी नहीं लौटता, नया ही होकर लौटता है। लौट कर सारे संबंध उसके मन से बदल जाते हैं; लेकिन लौटता है मन में।
पहले जब मन में था तो गुलाम था मन का, कोई मालकियत न थी अपनी। मन जो चाहता था, करा लेता था; मन जो बताता था, वही मानना पड़ता था; मन जहां दौड़ाता था, वहीं दौड़ना पड़ता था। मन की गुलामी थी; मन के हाथ में लगाम थी आत्मा की।
समाधि के द्वार से लौटता है साधक जब वापस मन में, तो मालिक होकर लौटता है। लगाम उसकी अब अपने हाथ में होती है। अब मन को जहां ले जाना चाहता है, वहां ले जाता है। नहीं ले जाना चाहता तो नहीं ले जाता। चलाना चाहता है तो चलाता है, नहीं चलाना चाहता तो नहीं चलाता है। मन की अब अपनी कोई सामर्थ्य नहीं रह जाती। लेकिन समाधि को उपलब्ध साधक जब मन में लौटता है--मालिक होकर--तभी वह स्मरण कर सकता है। क्योंकि स्मरण मन की क्षमता है। तभी वह पीछे लौट कर देख सकता है मन के द्वारा कि क्या हुआ था!
इसका मतलब यह हुआ कि मन केवल संसार की ही घटनाओं को अंकित नहीं करता है, जब साधक समाधि में पहुंचता है, और जो घट रहा होता है, वह भी मन अंकित करता है। मन दोहरा दर्पण है। उसमें बाहर का जगत भी प्रतिबिंबित होता है, उसमें भीतर का जगत भी प्रतिबिंबित होता है। तो जब साधक लौटता है मन में तभी अनुभव कर पाता है कि क्या घटा! तो फिर वह तीन सीढ़ियों से लौटे, तो ही अभिव्यक्ति कर सकता है।"
 

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