ओशो ऑडियो पुस्तक - प्रवचन: Ishavasya Upanishad--ईशावास्योपनिषद – वह ब्रह्म है  (mp3)

 

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Ishavasya Upanishad--ईशावास्योपनिषद

Track #10 of the Series, Ishavasya Upanishad--ईशावास्योपनिषद

ईशावास्य उपनिषद की आधारभूत घोषणा: सब-कुछ परमात्मा का है। इसीलिए ईशावास्य नाम है--ईश्वर का है सब-कुछ। मन करता है मानने का कि हमारा है। पूरे जीवन इसी भ्रांति में हम जीते हैं। कुछ हमारा है--मालकियत, स्वामित्व--मेरा है। ईश्वर का है सब-कुछ, तो फिर मेरे मैं को खड़े होने की कोई जगह नहीं रह जाती। मैं के लिए मेरे के बुनियादी पत्थर चाहिए, अन्यथा मैं का पूरा मकान गिर जाता है। ईशावास्य की पहली घोषणा उस पूरे मकान को गिरा देने वाली है। कहता है ऋषि: सब-कुछ परमात्मा का है। मेरे का कोई उपाय नहीं। मैं भी अपने को मेरा कह सकूं, इसका भी उपाय नहीं। कहता हूं अगर, तो नाजायज। अगर कहता ही चला जाता हूं, तो विक्षिप्त। मैं भी मेरा नहीं हूं।
 
 
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उद्धरण: ईशावास्योपनिषद,पहला प्रवचन
"यह महावाक्य कई अर्थों में अनूठा है। एक तो इस अर्थ में कि ईशावास्य उपनिषद इस महावाक्य पर शुरू भी होता है और पूरा भी। जो भी कहा जाने वाला है, जो भी कहा जा सकता है, वह इस सूत्र में पूरा आ गया है। जो समझ सकते हैं, उनके लिए ईशावास्य आगे पढ़ने की कोई भी जरूरत नहीं है। जो नहीं समझ सकते हैं, शेष पुस्तक उनके लिए ही कही गई है।
इसीलिए साधारणतः ॐ शांतिः शांतिः शांतिः का पाठ, जो कि पुस्तक के अंत में होता है, इस पहले वचन के ही अंत में है। जो जानते हैं, उनके हिसाब से बात पूरी हो गई है। जो नहीं जानते हैं, उनके लिए सिर्फ शुरू होती है।
इसलिए भी यह महावाक्य बहुत अदभुत है कि पूरब और पश्चिम के सोचने के ढंग का भेद इस महावाक्य से स्पष्ट होता है। दो तरह के तर्क, दो तरह की लाजिक सिस्टम्स विकसित हुई हैं दुनिया में--एक यूनान में, एक भारत में।
यूनान में जो तर्क की पद्धति विकसित हुई उससे पश्चिम के सारे विज्ञान का जन्म हुआ और भारत में जो विचार की पद्धति विकसित हुई उससे धर्म का जन्म हुआ। दोनों में कुछ बुनियादी भेद हैं। और सबसे पहला भेद यह है कि पश्चिम में, यूनान ने जो तर्क की पद्धति विकसित की, उसकी समझ है कि निष्कर्ष, कनक्लूजन हमेशा अंत में मिलता है। साधारणतः ठीक मालूम होगी बात। हम खोजेंगे सत्य को, खोज पहले होगी, विधि पहले होगी, प्रक्रिया पहले होगी, निष्कर्ष तो अंत में हाथ आएगा। इसलिए यूनानी चिंतन पहले सोचेगा, खोजेगा, अंत में निष्कर्ष देगा।
भारत ठीक उलटा सोचता है। भारत कहता है, जिसे हम खोजने जा रहे हैं, वह सदा से मौजूद है। वह हमारी खोज के बाद में प्रगट नहीं होता, हमारे खोज के पहले भी मौजूद है। जिस सत्य का उदघाटन होगा वह सत्य, हम नहीं थे, तब भी था। हमने जब नहीं खोजा था, तब भी था। हम जब नहीं जानते थे, तब भी उतना ही था, जितना जब हम जान लेंगे, तब होगा। खोज से सत्य सिर्फ हमारे अनुभव में प्रगट होता है। सत्य निर्मित नहीं होता। सत्य हमसे पहले मौजूद है। इसलिए भारतीय तर्कणा पहले निष्कर्ष को बोल देती है फिर प्रक्रिया की बात करती है--दि कनक्लूजन फर्स्ट, देन दि मैथडलाजी एंड दि प्रोसेस। पहले निष्कर्ष, फिर प्रक्रिया। यूनान में पहले प्रक्रिया, फिर खोज, फिर निष्कर्ष।
"
 

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