ऑडियोपुस्तकें – चयनित प्रवचन
के रूप में भी जाना जाता है
प्रवचन ९ : भजगोविन्दम्‌ मूढ़मते

ओशो ऑडियोबुक - चुने व्यक्तिगत टॉक:  दुख क्यों है? - Dhuk Kyon Hai?  (mp3)

 

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दुख क्यों है? - Dhuk Kyon Hai?

काम का अर्थ समझ लो। काम का अर्थ है: दूसरे से सुख मिल सकता है, इसकी आशा। काम का अर्थ है: मेरा सुख मेरे बाहर है। और ध्यान का अर्थ है: मेरा सुख मेरे भीतर है। बस, अगर ये दो परिभाषाएं ठीक से समझ में आ जाएं, तो तुम्हारी यात्रा बड़ी सुगम हो जाएगी। काम का अर्थ है: मेरा सुख मुझसे बाहर है--किसी दूसरे में है; कोई दूसरा देगा तो मुझे मिलेगा; मैं अकेला सुख न पा सकूंगा; मेरे अकेले होने में दुख है और दूसरे के संग-साथ में सुख है। इसीलिए तो तुम अकेले नहीं होना चाहते। जरा भी अकेले हुए कि तुम डरे; जरा भी अकेले हुए कि तुम बेचैन; जरा भी अकेले हुए कि तुमने अपने को भरा, कूड़ा-करकट कुछ भी मिले। जिस अखबार को तुम सुबह से तीन दफे पढ़ चुके हो, उसी को फिर पढ़ने लगे। जरा अकेले हुए कि कुछ तो भरो, खालीपन अखरता है। रेडियो चला दो, शोरगुल ही होगा, लेकिन ऐसा तो लगेगा कि अकेले नहीं हो। ताश खेलो, होटल में बैठ जाओ, क्लब चले जाओ--कहीं भी, किसी भांति...। ओशो
 
 
ऑडियोपुस्तकें - विवरण प्रवचनमाला: भजगोविन्दम्‌ मूढ़मते, #९
 
Osho International
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काम का अर्थ है: मेरा सुख मुझसे बाहर है--किसी दूसरे में है; कोई दूसरा देगा तो मुझे मिलेगा; मैं अकेला सुख न पा सकूंगा; मेरे अकेले होने में दुख है और दूसरे के संग-साथ में सुख है। इसीलिए तो तुम अकेले नहीं होना चाहते। जरा भी अकेले हुए कि तुम डरे; जरा भी अकेले हुए कि तुम बेचैन; जरा भी अकेले हुए कि तुमने अपने को भरा, कूड़ा-करकट कुछ भी मिले। जिस अखबार को तुम सुबह से तीन दफे पढ़ चुके हो, उसी को फिर पढ़ने लगे। जरा अकेले हुए कि कुछ तो भरो, खालीपन अखरता है। रेडियो चला दो, शोरगुल ही होगा, लेकिन ऐसा तो लगेगा कि अकेले नहीं हो। ताश खेलो, होटल में बैठ जाओ, क्लब चले जाओ--कहीं भी, किसी भांति...।--ओशो
 
 
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और आगे ओशो कहते हैं:
तुम जिसको अपने जीवन की व्यस्तता कहते हो, उसमें से बहुत सी व्यस्तता तो जरूरी नहीं है; उसमें से बहुत सी व्यस्तता तो तुम काट सकते हो; उसमें से बहुत सा समय तो विश्राम का हो सकता है। लेकिन मामला ऐसा नहीं है कि काम जरूरी है, मामला ऐसा है कि बिना काम के तुम अकेले हो जाते हो।
पश्चिम में मनोवैज्ञानिक एक नई चिंता से भर गए हैं। वह चिंता पहली दफा मनुष्य-जाति के इतिहास में आई है। और वह चिंता यह है कि इस सदी के पूरे होते-होते, कम से कम पश्चिम के कुछ मुल्कों में--अमेरिका में, स्वीडन में--इतनी सुख-सुविधा हो जाएगी और सारा काम करीब-करीब स्वचालित यंत्रों से होने लगेगा कि आदमी के पास बहुत समय बचेगा। तो मनोवैज्ञानिकों को बड़ा खतरा है कि आदमी करेगा क्या? क्योंकि अभी खाली होने की योग्यता आदमी की नहीं है; अभी चुप बैठने की क्षमता आदमी की नहीं है।
थोड़ा सोचो--सारा काम यंत्र कर देता हो और तुम्हारे पास कुछ काम न बचे! अभी यद्यपि तुम रोते हो कि काम ही काम है, कोई फुरसत नहीं; अभी तुम सोचते भी हो कि फुरसत मिल जाए तो तुम कुछ विश्राम कर लो। यद्यपि अभी भी जब फुरसत मिलती है, तुम विश्राम करते नहीं। रविवार की छुट्टी काटे नहीं कटती। रविवार की छुट्टी काटने को तुम कितने उपाय करते हो? पिकनिक को चले। कोई उपद्रव न था, तो उपद्रव बांधा। घर नहीं बैठे रह सकते; छुट्टी काटे नहीं कटती। रविवार के दिन तुम सोमवार की राह देखने लगते हो--कब सुबह हो, कब तुम अपने काम में लगो।
थोड़ा सोचो कि पूरा जीवन रविवार की छुट्टी हो। तुम बच सकोगे उतने विश्राम में? तुम झेल सकोगे उस शांति को, उस एकांत को? नहीं, तुम कुछ न कुछ खतरे कर लोगे; तुम कुछ झंझटें खड़ी करोगे; तुम कुछ उपाय करोगे, जिसमें तुम उलझ जाओ।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हमें कुछ ऐसे काम खोजने पड़ेंगे, जिनकी कोई जरूरत तो न होगी, लेकिन लोग जो खाली नहीं बैठ सकते, उनको हमें देना पड़ेंगे। और एक बड़ी अनूठी बात खयाल में आनी शुरू हुई है और वह यह कि जो लोग बिलकुल खाली बैठने को राजी होंगे, उनको सरकार तनख्वाह देगी कि वे खाली बैठने के लिए राजी हैं। जो काम करेंगे, उनको तनख्वाह नहीं मिलेगी; क्योंकि काम भी लो और तनख्वाह भी लो--दोनों एक साथ!
-- ओशो
 

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