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प्रवचन ४ : भक्ति सूत्र

ओशो ऑडियोबुक - चुने व्यक्तिगत टॉक: जीवन: आशा और निराशा के पार – Jeevan: Asha Aur Nirasha Ke Paar (mp3)

 

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जीवन: आशा और निराशा के पार – Jeevan: Asha Aur Nirasha Ke Paar

Track #4 of the Series, भक्ति सूत्र – Bhakti Sutra

"जीवन की व्यर्थता दिखाई पड़े तो परमात्मा की खोज शुरू हो सकती है—शुरू होगी ही, ऐसा जरूरी नहीं है। जीवन की व्यर्थता पता चले तो आदमी निराश भी हो सकता है, आशा ही छोड़ दे, व्यर्थता में ही जीने लगे, व्यर्थता को स्वीकार कर ले, खोज के लिए कदम न उठाए|
 
 
ऑडियोपुस्तकें - Details प्रवचनमाला: भक्ति सूत्र, #४
 
Osho International
86
"आस्तिक नास्तिक से आगे जाता है। आस्तिक नास्तिक का विरोध नहीं है, अतिक्रमण है। आस्तिक के जीवन में भी नास्तिकता का पड़ाव आता है, लेकिन उस पर वह रुक नहीं जाता। वह उसे पड़ाव ही मानता है और उससे मुक्त होने की चेष्टा में संलग्न हो जाता है।
 
 
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और आगे ओशो कहते हैं:
जिसने दुख जाना वह सुख को जानने में समर्थ है, अन्यथा दुख को भी न जान सकता। जिसने अंधकार को पहचाना उसके पास आंखें हैं जो प्रकाश को भी पहचानने में समर्थ हैं।
अंधों को अंधेरा नहीं दिखाई पड़ता। साधारणतः हम सोचते हैं कि अंधे अंधेरे में जीते होंगे--गलत है खयाल। अंधेरे को देखने के लिए भी आंख चाहिए। अंधेरा भी आंख की ही प्रतीति है। तुम्हें अंधेरा दिखाई पड़ता है आंख बंद कर लेने पर, क्योंकि अंधेरे को तुमने देखा है। जन्म से अंधे, जन्मांध व्यक्ति को अंधेरा भी दिखाई नहीं पड़ता। देखा ही नहीं है कुछ, अंधेरा कैसे दिखाई पड़ेगा?
तो जिसको अंधेरा दिखाई पड़ता है, उसके पास आंख है; अंधेरे में ही रुक जाने का कोई कारण नहीं है। और जब अंधेरा अंधेरे की तरह मालूम पड़ता है तो साफ है कि तुम्हारे भीतर छिपा हुआ प्रकाश का भी कोई स्रोत है, अन्यथा अंधेरे को अंधेरा कैसे कहते? कोई कसौटी है तुम्हारे भीतर, कहीं गहरे में छिपा मापदंड है।
अंधेरे पर कोई रुक जाए तो नास्तिक; अंधेरे को पहचान कर प्रकाश की खोज में निकल जाए तो आस्तिक। अंधेरे को देख कर कहने लगे कि अंधेरा ही सब कुछ है तो नास्तिक; अंधेरे को जान कर अभियान पर निकल जाए, खोजने निकल जाए, कि प्रकाश भी कहीं होगा, जब अंधेरा है तो प्रकाश भी होगा। क्योंकि विपरीत सदा साथ मौजूद होते हैं।
जहां जन्म है वहां मृत्यु होगी। जहां अंधेरा है वहां प्रकाश होगा। जहां दुख है वहां सुख होगा। जहां नरक अनुभव किया है तो खोजने की ही बात है, स्वर्ग भी ज्यादा दूर नहीं हो सकता।
स्वर्ग और नरक पड़ोस-पड़ोस में हैं, एक-दूसरे से जुड़े हैं।
अगर तुमने जीवन में क्रोध का अनुभव कर लिया तो समझ लेना कि करुणा भी कहीं छिपी है--खोजने की बात है। तुमने पहली परत छू ली करुणा की! क्रोध पहली परत है करुणा की। अगर तुमने घृणा को पहचान लिया तो प्रेम को पहचानने में देर भला लगे, लेकिन असंभावना नहीं है।
प्रश्न महत्वपूर्ण है।
जीवन की व्यर्थता तो अनिवार्य है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। उतने को ही परमात्मा की शुरुआत मत समझ लेना। उतने से ही ‘अथातो’ का बिंदु न आ जाएगा। उतना जरूरी है। उतना तो चाहिए ही। पर उस पर तुम रुक भी सकते हो।
पश्चिम में बड़ा विचारक है: ज्यां पाल सार्त्र। वह कहता है, अंधेरा ही सब कुछ है। दुख ही सब कुछ है। दुख के पार कुछ भी नहीं है। दुख के पार तो सिर्फ मनुष्यों की कल्पनाओं का जाल है। विषाद सब कुछ है। संताप सब कुछ है। संत्रास सब कुछ है। बस नरक ही है, स्वर्ग नहीं है।--ओशो
 

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