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प्रवचन २५ : जिन सूत्र

ओशो ऑडियोबुक - चुने व्यक्तिगत टॉक: मोक्ष की सीढ़ियां – Moksh Ki Sidhiyan (mp3)

 

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मोक्ष की सीढ़ियां – Moksh Ki Sidhiyan

Track #9 of the Series, जिन-सूत्र – Jin Sutra, Vol.2

जब जीवन और श्रद्धा साथ-साथ चलने लगे, जब जीवन श्रद्धा के पीछे छाया की भांति चलने लगे, तभी जानना की श्रद्धा सच्ची है।
 
 
ऑडियोपुस्तकें - Details प्रवचनमाला: जिन सूत्र, #२५
 
Osho International
86
"विचार और आचरण एक ही यात्रा के हिस्से हैं। विचार पहला कदम है; आचरण अंतिम। अगर कोई विचार आचरण न बनता हो तो इस बात का एक ही अर्थ होता है कि वह विचार तुम्हारा नहीं है। इसलिए कैसे आचरण बने? चिकित्सकों से पूछो!
 
 
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और आगे ओशो कहते हैं:
जीवन का आधार ज्ञान पर मत रखना--दृष्टि पर, दर्शन पर रखना। अधिक लोगों ने जीवन के आधार ज्ञान पर रख लिए हैं। तर्क से, विचार से, बुद्धि से जो बात ठीक लगी है--सोचा, उसे स्वीकार कर लें। लेकिन जो तर्क से ठीक लगा है वह हृदय तक न जा सकेगा, क्योंकि तर्क की पहुंच हृदय तक नहीं। तर्क तो सिर्फ खोपड़ी की खुजलाहट है; बहुत ऊपर-ऊपर है। प्राणों को आंदोलित नहीं करता तर्क।
तर्क के लिए कभी किसी ने प्राण दिये? तर्क के लिए कभी कोई शहीद हुआ? तुम जिसके लिए मर सको, वही तुम्हारी श्रद्धा है। तुम जिसके बिना जी न सको, वही तुम्हारी श्रद्धा है। तुम कहो जीयेंगे तो इसके साथ, इसके बिना तो मृत्यु हो जायेगी--वही श्रद्धा है। जो जीवन से भी बड़ी है, वही श्रद्धा है। जिसके लिए जीवन भी निछावर किया जा सकता है, वही श्रद्धा है।
तर्क के लिए तुमने कभी किसी को जीवन निछावर करते देखा? दो और दो चार होते हैं--इस सत्य का अगर कोई प्रतिपादन करता हो और तुम तलवार लेकर खड़े हो जाओ, तो क्या वह सत्य की रक्षा के लिए अपने जीवन को देना चाहेगा? मूढ़तापूर्ण मालूम पड़ेगा।
दो और दो चार होते हैं, इसके लिए मरने में कोई सार न मालूम होगा। वह कहेगा कि तुम्हारी मर्जी, दो और दो पांच कर लो कि दो और दो तीन कर लो; लेकिन दो और दो चार कोई ऐसी बात नहीं जिसके लिए मैं जीवन को गंवा दूं।
प्रेम के लिए कोई जीवन को गंवा सकता है। इसलिए श्रद्धा प्रेम की भांति है। महावीर कहते हैं, श्रद्धा पर जीवन को खड़ा करना। महावीर की श्रद्धा को समझ लेना। उनका विशेष शब्द है: श्रद्धान। यह तुम जिसे साधारणतः श्रद्धा कहते हो उससे महावीर का कोई प्रयोजन नहीं है। लोग कहते हैं, हमारी तो ईश्वर में बड़ी श्रद्धा है। जिसे तुमने देखा नहीं, श्रद्धा होगी कैसे? श्रद्धा कान से नहीं होती, श्रद्धा आंख से होती है।
इसलिए श्रद्धान का दूसरा नाम महावीर ‘दर्शन’ कहते हैं। श्रद्धान और दर्शन महावीर की भाषा में पर्यायवाची हैं; एक ही अर्थ रखते हैं, उनमें जरा भी फर्क नहीं है।—ओशो
 

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