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ओशो ऑडियोबुक: Agyat Ki Or--अज्ञात की ओर  (mp3)

 

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अज्ञात की ओर – Agyat Ki Or

जीवन के विभिन्न पहलुओं पर ओशो द्वारा दिए गए पांच प्रवचन

“मैं अत्यंत आनंदित हूं अपने हृदय की थोड़ी सी बात आपसे कर पाऊंगा इसलिए। आनंद जितना बंट जाए, उतना बढ़ जाता है। जो मुझे दिखाई पड़ता है जीवन जैसा सुंदर, जैसा संगीत से पूर्ण, जैसा आह्लादकारी, जैसी धन्यता मुझे उसमें दिखाई पड़ती है, हृदय में कामना उठती है आपको भी जीवन वैसा दिखाई पड़े। और स्मरण रहे, जीवन वैसा ही हो जाता है जैसी देखने की हमारे पास दृष्टि होती है। वही जीवन नरक हो सकता है, वही स्वर्ग भी; वही बंधन हो सकता है और वही मुक्ति भी। लेकिन इधर कई हजार वर्षों से जीवन को बदलने की नहीं बल्कि जीवन से भागने की शिक्षा दी गई।समझाया गया है कि जीवन को छोड़ दो, और समझाया गया है कि जीवन से ही जो मुक्त हो जाए वही परम धन्य है।“
 
 
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Osho Media International
 
 
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उद्धरण: अज्ञात की ओर,पहला प्रवचन
यह बात एकदम घातक, एकदम विष-भरी है। इस शिक्षा का यह दुष्परिणाम हुआ, इस संस्कार का यह दुष्परिणाम हुआ कि जो जीवन बदला जा सकता था, जो दृष्टि इसी जीवन में परमात्मा को अनुभव कर सकती थी, उसके पैदा होने की सारी संभावना समाप्त हो गई। जो लोग जीवन से भागना शुरू कर देते हैं, वे जीवन को बदलने में असमर्थ हो जाते हैं। और वे लोग भी जीवन को बदलने में असमर्थ हो जाते हैं जो जीवन को भोगना शुरू कर देते हैं। जीवन को भोगने वाला भोग में भटक जाता है, जीवन से भागने वाला भागने में; और जीवन को जानने से दोनों वंचित रह जाते हैं।
दो ही प्रकार के लोग हैं, दो ही प्रकार की शिक्षाएं हैं, दो ही प्रकार की दृष्टियां हैं। और उन दोनों दृष्टियों के तनाव में, उन दोनों दृष्टियों के टेंशन में मनुष्य का निरंतर, निरंतर जीवन क्षीण होता गया, अंधकारपूर्ण होता गया।
जीवन दोनों ही तरह से उलझ जाता है। ये दो जीवन के रूप करीब-करीब हर मनुष्य के सामने विकल्प होकर खड़े हो जाते हैं। एक रास्ता है जीवन में वासनाओं को भोगने का, उनमें डूब जाने का। एक रास्ता है उनसे भाग जाने का, उनके प्रति पीठ मोड़ लेने का। और ये दो ही बातें निरंतर हमारे समक्ष हैं।
मैं आपसे निवेदन करूंगा, दोनों ही बातें जीवन को नष्ट कर देती हैं। संसार भी नष्ट कर देता है और संन्यास भी। भोग भी नष्ट कर देता है और त्याग भी। क्या कोई और दृष्टि भी हो सकती है जीवन के प्रति जागने की? क्या कोई ओर मार्ग भी हो सकता है? उसकी मैं चर्चा करूंगा, लेकिन इसके पहले कि मैं उसकी चर्चा करूं यह कह देना, यह समझ लेना जरूरी होगा कि ये दोनों मार्ग क्यों जीवन को नष्ट कर देते हैं? भोग का मार्ग क्यों जीवन को नष्ट कर देता है? जीवन भर इच्छाओं और वासनाओं के पीछे दौड़ कर जीवन क्यों समाप्त हो जाता है? हाथ क्यों रिक्त रह जाते हैं और खाली? कोई उपलब्धि, कोई प्राप्ति, प्राणों का कहीं पहुंचना क्यों नहीं हो पाता?
नहीं हो पाता यह तो हम जानते हैं, अपने अनुभव से भी, औरों के अनुभव से भी। मनुष्य-जाति के हजारों वर्ष के अनुभव यही कहते हैं--नहीं पहुंचना हो पाता। वासना में जितना दौड़ते हैं, जितना डूबते हैं, मन और रिक्त और खाली होता चला जाता है। —ओशो