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Ashtavakra Mahagita, Vol.8 -- अष्‍टावक्र : महागीता—भाग आठ (Audio)

 

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अष्‍टावक्र : महागीता—भाग आठ – Ashtavakra Mahagita, Vol.8

अष्टावक्र-संहिता के सूत्रों पर प्रश्नोत्तर सहित पुणे में हुई प्रवचनमाला के अंतर्गत ओशो द्वारा दिए गए 91 अमृत प्रवचनों में से 10 (71 से 80) प्रवचनों का संग्रह|

अष्टावक्र और राजा जनक के बीच इस अदभुत संवाद की गरिमा को ओशो ने अपनी अमृत वाणी द्वारा उसकी पूर्णता में प्रकट किया है। अष्टावक्र-जनक संवाद एवं प्रश्नोत्तर के माध्यम से ओशो धर्म, साधना, तथा चेतना की अतल गहराई में हमें ले चलते हैं। इस अपूर्व संवाद को महागीता कहकर ओशो ने उसमें अनूठी प्राण-प्रतिष्ठा की है।
 
 
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उद्धरण: अष्‍टावक्र : महागीता—भाग आठ , पहला प्रवचन
मैं तुमसे कहना चाहता हूं, ज्ञानी पुरुष ही तय कर सकते हैं कि क्या सपना है और क्या सच है। लेकिन हम क्यों नहीं तय कर पाते? हम चूकते क्यों चले जाते हैं? हम चूकते चले जाते हैं क्योंकि हम सोचते हैं, जो देखा उसमें ही तय करना है। जो देखा उसमें क्या सच और जो देखा उसमें क्या झूठ।
दिन में देखा वह सच हम कहते हैं, रात जो देखा वह झूठ। जागकर जो देखा वह सच, सोकर जो देखा वह झूठ। आंख खुली रखकर जो देखा वह सच, आंख बंद रखकर देखा जो झूठ। सबके साथ जो देखा सच, अकेले में जो देखा वह झूठ। लेकिन हम एक बात कभी नहीं सोचते कि हम देखे और देखे में ही तौल करते रहते हैं।
ज्ञानी कहते हैं, जिसने देखा वह सच, जो देखा वह सब झूठ--जागकर देखा कि सोकर देखा, अकेले में देखा कि भीड़ में देखा, आंख खुली थी कि आंख बंद थी--जो भी देखा वह सब झूठ। देखा देखा सो झूठ। जिसने देखा, बस वही सच।
द्रष्टा सत्य और दृश्य झूठ।
दो दृश्यों में तय नहीं करना है कि क्या सच और क्या झूठ, द्रष्टा और दृश्य में तय करना है। द्रष्टा का हमें कुछ पता नहीं है।
अष्टावक्र का यह पूरा संदेश द्रष्टा की खोज है। कैसे हम उसे खोज लें जो सबका देखने वाला है।
तुम अगर कभी परमात्मा को भी खोजते हो तो फिर एक दृश्य की भांति खोजने लगते हो। तुम कहते हो, संसार तो देख लिया झूठ, अब परमात्मा के दर्शन करने हैं। मगर दर्शन से तुम छूटते नहीं, दृश्य से तुम छूटते नहीं। धन देख लिया, अब परमात्मा को देखना है। प्रेम देख लिया, संसार देख लिया, संसार का फैलाव देख लिया, अब संसार के बनानेवाले को देखना है; मगर देखना है अब भी। जब तक देखना है तब तक तुम झूठ में ही रहोगे। तुम्हारी दूकानें झूठ हैं। तुम्हारे मंदिर भी झूठ हैं, तुम्हारे खाते-बही झूठ हैं, तुम्हारे शास्त्र भी झूठ।
जहां तक दृश्य पर नजर अटकी है वहां तक झूठ का फैलाव है। जिस दिन तुमने तय किया अब उसे देखें जिसने सब देखा, अब अपने को देखें, उस दिन तुम घर लौटे। उस दिन क्रांति घटी। उस दिन रूपांतरण हुआ। द्रष्टा की तरफ जो यात्रा है वही धर्म है। —ओशो
 

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