ऑडियोपुस्तकें Series
- also available as a ई-पुस्तकें Series (English)

ओशो ऑडियोबुक: Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद (mp3)

 

Availability: In stock

रु. 0.00
मोल  

Adhyatma Upanishad--अध्यात्म उपनिषद

ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई प्रवचनमाला के अंतर्गत ओशो द्वारा अध्यात्म उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह प्रवचन

एक ॠषि की स्वच्छ और पैनी दृष्टि इन सूत्रों में निहित है। उस पर ओशो की प्रबुद्ध वाणी और गहरी अभिव्यक्ति ने और भी अधिक धार दी है। द्रष्टा का बोध एवं उसकी प्रक्रिया, साक्षी का स्वरूप और उसका जीवन में प्रतिफलन, उपनिषद की इस मूल धारा को ओशो कहते हैं,‘‘उपनिषद मन का विलास नहीं, जीवन का रूपांतरण है।’’ -ओशो
 
 
विवरणचुनना... या सभी का चयन ऑडियोपुस्तकें शीर्षक लंबाई
 
Osho Media International
 
 
Price Individual Item: रु. 100.00 और अब खरीदने 17 Tracks in Total – और अधिक के लिए आगे चलें
 
उद्धरण:अध्यात्म उपनिषद, सत्रहवां प्रवचन
"यह उपनिषद बड़े अनूठे ढंग से समाप्त होता है। गुरु के उपदेश से समाप्त नहीं होता, शिष्य की उपलब्धि से समाप्त होता है। गुरु ने क्या कहा, इस पर ही समाप्त नहीं होता; शिष्य को क्या हो गया, इस पर समाप्त होता है। और जब तक कोई शिक्षा हो न जाए जीवन, तब तक उसका कोई भी मूल्य नहीं है।
जब तक कोई शिक्षा जीवंत न हो सके, तब तक मन का विलास है।उपनिषद मन का विलास नहीं है, जीवन का रूपांतरण है। गुरु ने अपांतरम को दी, अपांतरम ने ब्रह्मा को दी, ब्रह्मा ने घोरांगिरस को दी, घोरांगिरस ने रैक्व को दी, रैक्व ने राम को दी, राम ने समस्त भूतप्राणियों को दी।
और हमने पुनः इस अदभुत चिंतन, दर्शन, साधन की पद्धति को, फिर से अपने भीतर जगाने की कोशिश की, फिर से थोड़ी लौ को उकसाया। यहां से जाने के बाद, उस लौ को उकसाते रहना। कभी ऐसी घड़ी जरूर आ जाएगी कि आप भी कह सकेंगे: अभी-अभी देखा था उस जगत को, वह कहां गया? क्या वह नहीं है? और जिस दिन आपको भी ऐसा अनुभव होगा, उस दिन आप भी कह सकेंगे: मैं हरि हूं, मैं सदाशिव हूं, अनंत हूं, आनंद हूं, मैं ब्रह्म हूं।
और जब तक यह आपके भीतर न हो जाए, तब तक कैसा यह निर्वाण का उपदेश? कैसा यह वेद का सार? और तब तक यह उपनिषद यहां तो समाप्त हो गया, लेकिन आपके लिए समाप्त नहीं हुआ है। एक दिन ऐसा आए कि आप भी कह सकें कि उपनिषद की शिक्षा मेरे लिए भी समाप्त हो गई। मैं वहां पहुंच गया जहां उपनिषद पहुंचाना चाहते हैं।""--ओशो
 

Email this page to your friend