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ओशो ऑडियोबुक: Gita Darshan, Adhyaya 13--गीता-दर्शन, अध्याय तेरह (mp3)

 

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गीता-दर्शन, अध्याय तेरह – Gita Darshan, Adhyaya 13

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय तेरह ‘क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग’ पर क्रास मैदान, मुंबई में हुई प्रवचनमाला के अंतर्गत प्रश्नोत्तर सहित ओशो द्वारा दिए गए बारह प्रवचन

ओशो के ये प्रवचन जीवन को जीने के सूत्र देते हैं। उनका जोर हमारी मूर्छा तोड़ने पर है, पांडित्यपूर्ण कोरे विवेचन पर नहीं। यदि कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान पर गीत गाया है, तो ओशो ने उसे बडी मधुरता से संगीतबद्ध किया है वे हमे सावचेत करते हैं, ''गीता काव्य है, इसलिये एक-एक शब्द को, जैसे हम काव्य को समझते हैं, वैसे समझना होगा; कठोरता से नहीं, काट-पीट से नहीं, बड़ी श्रद्धा और सहानुभूति से; एक दुश्मन की तरह नहीं, एक प्रेमी की तरह; तो ही रहस्य खुलेगा, और तो ही आप उस रहस्य के साथ आत्मसात हो पाएंगे।''
 
 
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उद्धरण: गीता-दर्शन, अध्याय तेरह
सुबह से सांझ तक न मालूम कितने प्रकार के दुखी लोगों से मेरा मिलना होता है। एक बात की मैं तलाश करता रहा हूं कि कोई ऐसा दुखी आदमी मिल जाए, जिसके दुख का कारण कोई और हो। अब तक वैसा आदमी खोज नहीं पाया। दुख चाहे कोई भी हो, दुख के कारण में आदमी खुद स्वयं ही होता है। दुख के रूप अलग हैं, लेकिन दुख की जिम्मेवारी सदा ही स्वयं की है।
दुख कहीं से भी आता हुआ मालूम होता हो, दुख स्वयं के ही भीतर से आता है। चाहे कोई किसी परिस्थिति पर थोपना चाहे, चाहे किन्हीं व्यक्तियों पर, संबंधों पर, संसार पर, लेकिन दुख के सभी कारण झूठे हैं। जब तक कि असली कारण का पता न चल जाए। और वह असली कारण व्यक्ति स्वयं ही है। पर जब तक यह दिखाई न पड़े कि मेरे दुख का कारण मैं हूं, तब तक दुख से छुटकारे का कोई उपाय नहीं है। क्योंकि ठीक कारण का ही पता न हो, ठीक निदान ही न हो सके, तो इलाज के होने का कोई उपाय नहीं है। और जब तक मैं भ्रांत कारण खोजता रहूं, तब तक कारण तो मुझे मिल सकते हैं, लेकिन समाधान, दुख से मुक्ति, दुख से छुटकारा नहीं हो सकता।
और आश्चर्य की बात है कि सभी लोग सुख की खोज करते हैं। और शायद ही कोई कभी सुख को उपलब्ध हो पाता है। इतने लोग खोज करते हैं, इतने लोग श्रम करते हैं, जीवन दांव पर लगाते हैं और परिणाम में दुख के अतिरिक्त हाथ में कुछ भी नहीं आता। जीवन के बीत जाने पर सिर्फ आशाओं की राख ही हाथ में मिलती है। सपने, टूटे हुए; इंद्रधनुष, कुचले हुए; असफलता, विफलता, विषाद!
मौत के पहले ही आदमी दुखों से मर जाता है। मौत को मारने की जरूरत नहीं पड़ती; आप बहुत पहले ही मर चुके होते हैं; जिंदगी ही काफी मार देती है। जीवन आनंद का उत्सव तो नहीं बन पाता, दुख का एक तांडव नृत्य जरूर बन जाता है।
और तब स्वाभाविक है कि यह संदेह मन में उठने लगे कि इस दुख से भरे जीवन को क्या परमात्मा ने बनाया होगा? और अगर परमात्मा इस दुख से भरे जीवन को बनाता है, तो परमात्मा कम और शैतान ज्यादा मालूम होता है। और अगर इतना दुख जीवन का फल है, तो परमात्मा सैडिस्ट, दुखवादी मालूम होता है। लोगों को सताने में जैसे उसे कुछ रस आता हो! तो फिर स्वाभाविक ही है कि अधिक लोग दुख के कारण परमात्मा को अस्वीकार कर दें।
जितना ही मैं इस संबंध में लोगों के मनों की छानबीन करता हूं, तो मुझे लगता है कि नास्तिक कोई भी तर्क के कारण नहीं होता। नास्तिक लोग दुख के कारण हो जाते हैं। तर्क तो पीछे आदमी इकट्ठे कर लेता है।
लेकिन जीवन में इतनी पीड़ा है कि आस्तिक होना मुश्किल है। इतनी पीड़ा को देखते हुए आस्तिक हो जाना असंभव है। या फिर ऐसी आस्तिकता झूठी होगी, ऊपर-ऊपर होगी, रंग-रोगन की गई होगी। ऐसी आस्तिकता का हृदय नहीं हो सकता। आस्तिकता तो सच्ची सिर्फ आनंद की घटना में ही हो सकती है। जब जीवन एक आनंद का उत्सव दिखाई पड़े, अनुभव में आए, तो ही कोई आस्तिक हो सकता है।
आस्तिक शब्द का अर्थ है, समग्र जीवन को हां कहने की भावना। लेकिन दुख को कोई कैसे हां कह सके? आनंद को ही कोई हां कह सकता है। दुख के साथ तो संदेह बना ही रहता है। —ओशो
 

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