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ओशो ऑडियोबुक: Jin Khoja Tin Paiyan--जिन खोजा तिन पाइयां (mp3)

 

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Jin Khoja Tin Paiyan--जिन खोजा तिन पाइयां

ध्यान साधना शिविर, नारगोल में हुई प्रवचनमाला के अंतर्गत कुंडलिनी योग पर ओशो द्वारा दिए गए छह प्रवचन तथा ध्यान प्रयोग एवं मुंबई में साधना गोष्ठी के दौरान साधकों के साथ हुई तेरह अंतरंग वार्ताओं का संग्रह

जिस व्यक्ति ने स्वयं को रूपांतरित करने का बीड़ा उठा लिया है उसके लिए ‘जिन खोजा तिन पाइयां’ एक प्रकाश-स्तंभ का कार्य करती है। इस पुस्तक में ओशो ने कुंडलिनी जागरण, सात शरीर व सात चक्रों, ॐ के अनाहत नाद व तंत्र ‍के गुह्य आयामों पर प्रकाश डाला है। साधना के मार्ग पर श्वास की कीमिया क्या करती है, इसे ओशो ने इस पुस्तक में विस्तार से समझाया है। शक्तिपात के बारे में ओशो ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह साधक के लिए प्रोत्साहन बनना चा‍हिए, न कि गुलामी।
आध्यात्मिक अनुभवों की प्रामाणिकता की चर्चा ‍के साथ-साथ ओशो हमें इनके नकली प्रतिरूपों के बारे में भी साथ-साथ सचेत करते चलते हैं।
 
 
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Osho Media International
 
 
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उद्धरण: जिन खोजा तिन पाइयां, तेहरवां प्रवचन
दावेदार गुरुओं से बचोतो जहां दावा है--कोई कहे कि मैं शक्तिपात करूंगा, मैं ज्ञान दिलवा दूंगा, मैं समाधि में पहुंचा दूंगा, मैं ऐसा करूंगा, मैं वैसा करूंगा--जहां ये दावे हों, वहां सावधान हो जाना। क्योंकि उस जगत का आदमी दावेदार नहीं होता। उस जगत के आदमी से अगर तुम कहोगे भी जाकर कि आपकी वजह से मुझ पर शक्तिपात हो गया, तो वह कहेगा, तुम किसी भूल में पड़ गए; मुझे तो पता ही नहीं, मेरी वजह से कैसे हो सकता है! उस परमात्मा की वजह से ही हुआ होगा। वहां तो तुम धन्यवाद देने जाओगे तो भी स्वीकृति नहीं होगी कि मेरी वजह से हुआ है। वह तो कहेगा, तुम्हारी अपनी ही वजह से हो गया होगा। तुम किस भूल में पड़ गए हो, वह परमात्मा की कृपा से हो गया होगा। मैं कहां हूं! मैं किस कीमत में हूं! मैं कहां आता हूं!… तो जहां तुम्हें दावा दिखे--साधक को--वहीं सम्हल जाना। जहां कोई कहे कि ऐसा मैं कर दूंगा, ऐसा हो जाएगा, वहां वह तुम्हारे लिए तैयार कर रहा है; वह तुम्हारी मांग को जगा रहा है; वह तुम्हारी अपेक्षा को उकसा रहा है; वह तुम्हारी वासना को त्वरित कर रहा है। और जब तुम वासनाग्रस्त हो जाओगे, कहोगे कि दो महाराज! तब वह तुमसे मांगना शुरू कर देगा। बहुत शीघ्र तुम्हें पता चलेगा कि आटा ऊपर था, कांटा भीतर है।
इसलिए जहां दावा हो, वहां सम्हलकर कदम रखना, वह खतरनाक जमीन है। जहां कोई गुरु बनने को बैठा हो, उस रास्ते से मत निकलना; क्योंकि वहां उलझ जाने का डर है। इसलिए साधक कैसे बचे? बस वह दावे से बचे तो सबसे बच जाएगा। वह दावे को न खोजे; वह उस आदमी की तलाश न करे जो दे सकता है। नहीं तो झंझट में पड़ेगा। क्योंकि वह आदमी भी तुम्हारी तलाश कर रहा है--जो फंस सकता है। वे सब घूम रहे हैं। वह भी घूम रहा है कि किस आदमी को चाहिए। तुम मांगना ही मत, तुम दावे को स्वीकार ही मत करना। और तब...पात्र बनो, गुरु मत खोजो तुम्हें जो करना है, वह और बात है। तुम्हें जो तैयारी करनी है, वह तुम्हारे भीतर तुम्हें करनी है। और जिस दिन तुम तैयार होओगे, उस दिन वह घटना घट जाएगी; उस दिन किसी भी माध्यम से घट जाएगी। माध्यम गौण है; खूंटी की तरह है। जिस दिन तुम्हारे पास कोट होगा, क्या तकलीफ पड़ेगी खूंटी खोजने में? कहीं भी टांग दोगे। नहीं भी खूंटी होगी तो दरवाजे पर टांग दोगे। दरवाजा नहीं होगा, झाड़ की शाखा पर टांग दोगे। कोई भी खूंटी का काम कर देगा। असली सवाल कोट का है। —ओशो
 

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