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समाधि के द्वार पर - पुस्तकें

 

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मोल  

समाधि के द्वार पर - Samadhi Ke Dwar Par

ध्यान साधना पर पुणे में ध्यान प्रयोगों एवं प्रश्नोत्तर सहित हुई प्रवचनमाला के अंतर्गत ओशो द्वारा दिए गए छह प्रवचन

मानव जीवन की समस्याएं अनंत हो सकती हैं, लेकिन समाधान एक ही है : समाधि।
ओशो कहते हैं—"जैसे अंधेरे में कोई अचानक दीये को जला दे, और जहां कुछ भी दिखाई न पड़ता हो वहां सभी कुछ दिखाई पड़ने लगे, ऐसे ही जीवन के अंधकार में समाधि का दीया है। या जैसे कोई मरुस्थल में वर्षों से वर्षा न हुई हो और धरती के प्राण पानी के लिए प्यास से तड़पते हों, और फिर अचानक मेघ घिर जाएं और वर्षा की बूंदें पड़ने लगें, तो जैसा उस मरुस्थल के मन में शांति और आनंद नाच उठे, ऐसा ही जीवन के मरुस्थल में समाधि की वर्षा है। या जैसे कोई मरा हुआ अचानक जीवित हो जाए, और जहां श्वास न चलती हो वहां श्वास चलने लगे, और जहां आंखें न खुलती हों वहां आंखें खुल जाएं, और जहां जीवन तिरोहित हो गया था वहां वापस उसके पदचाप सुनाई पड़ने लगें, ऐसा ही मरे हुए जीवन में समाधि का आगमन है।"मानव जीवन की समस्याएं अनंत हो सकती हैं, लेकिन समाधान एक ही है : समाधि।
 
 
पुस्तकें - विवरण सामग्री तालिका
 
Rebel Publishing House, India
120
    अनुक्रम
    #1: समाधि के द्वार पर
    #2: समाधि के तीन चरण
    #3: सम्मोहन का उपयोग
    #4: एकाकीपन का बोध
    #5: मन की मृत्यु ही समाधि है
    #6: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, असंग्रह
 
 
मूल्य सूची: रु. 135.00
 
उद्धरण: समाधि के द्वार पर, तीसरा प्रवचन
"हम भी शब्दों के जोड़ हैं। बचपन से मौत तक, मरने तक, हम शब्दों को इकट्ठा कर रहे हैं। मेरा नाम! जो कि एक झूठ है। कोई नाम लेकर पैदा नहीं होता। लेकिन एक शब्द चिपक जाता है। मेरे घर का पता! कौन सा है मेरा घर? किसी भी घर में मुझे बड़ा किया जाता, वही मेरा घर हो जाता। मतलब यह कि मेरा कोई घर नहीं है। जिस घर की छाप मेरे मन पर बचपन से पड़ गई है, वही मेरा घर हो गया। कौन सा है मेरा देश? जिस देश में मैं आंखें खोलता, वही देश मेरा हो जाता। मतलब मेरा कोई देश नहीं है। आंखों ने पहली दफा जिस भूमि को पकड़ लिया, एक्सपोजर जिस भूमि पर आंख का पहले हो गया, वही है मेरा देश। कौन हैं मेरे प्रियजन? कौन हैं मेरे संबंधी? वे ही जिन पर मेरी आंखें खुलीं और जिनकी तस्वीरें मैंने पकड़ लीं। इन सबका जोड़ इकट्ठा हो गया है।

अगर इसमें से एक-एक चीज को निकालने लगें और पूछने लगें, कौन हूं मैं? तो कोई भी पता न चलेगा। जब सब जोड़ खाली हो जाएगा, रथ का सब सामान निकल जाएगा, तब बड़ी मुश्किल हो जाएगी पूछना कि कौन हूं मैं? तब कोई उत्तर न आएगा। फिर भी कुछ शेष रह जाएगा। वही शेष रह जाएगा जो मेरे जन्म के भी पहले था और जो मेरे मरने के भी बाद होता है। लेकिन मैं बिखर जाऊंगा, मैं नहीं रह जाऊंगा। ‘मैं’ एक जोड़ है।

एक क्षण है जब हमारा चित्त खुलता है और कुछ पकड़ लेता है। बचपन से हमारा चित्त खुलता रहता है, पकड़ता रहता है। फिर जो भी इकट्ठी हो गई है स्मृति, उसके जोड़ का नाम है मैं। मैं, मैं कोई सच्चाई नहीं है, मैं स्मृतियों का एलबम है, जोड़ है। और जब तक यह जोड़ हमें सबसे ज्यादा सत्य मालूम पड़ता है, तब तक इस जोड़ के पीछे जो है उसका पता न चलेगा।

परमात्मा हमसे कहीं वहां दूर नहीं है, परमात्मा हमसे यहां दूर है, भीतर की तरफ। वह जहां हमने मैं को इकट्ठा कर रखा है, उसके नीचे दबा है। परमात्मा मैं के नीचे दबा है। जैसे पेपर वेट के नीचे पन्ने दबे हों और तड़प रहे हों, हवा चलती हो और पन्ने तड़पते हों और पत्थर दबाए हो, ऐसे पूरे वक्त हमारे भीतर परमात्मा तड़प रहा है और मैं का पत्थर उसे दबाए हुए है।

समाधि में मैं को खो देना पड़ता है। मैं खो जाता है, पन्ने उड़ जाते हैं, तड़प मिट जाती है, भीतर जो छिपा है वह प्रकट हो जाता है।"—ओशो
 

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