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अमृत की दिशा - पुस्तकें

 

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अमृत की दिशा - Amrit Ki Disha

ध्यान साधना पर पुणे एवं मुंबई में ओशो द्वारा दिए गए पांच प्रवचन|

इस पुस्तक में ओशो हमें एक दिशा देते हैं—साहस की दिशा। साहस—उधार के विश्वासों से मुक्त होने का। साहस—तथ्यों को आर-पार देखने का। साहस—आत्म-जागरण के मार्ग पर चलने का। साहस—आनंदित होने का।
साथ ही चर्चा है मनुष्य-मन के कई प्रश्नों पर:
  • चित्त कैसे स्वतंत्र हो?
  • सत्य शास्त्रों में नहीं, तो कहां है?
  • पाप क्या है? क्या है उसका मूल?
  • अंतःसंघर्ष को कैसे मिटाएं?

  • इस पुस्तक में ओशो हमें एक दिशा देते हैं—साहस की दिशा। साहस—उधार के विश्वासों से मुक्त होने का। साहस—तथ्यों को आर-पार देखने का। साहस—आत्म-जागरण के मार्ग पर चलने का। साहस—आनंदित होने का।
    साथ ही चर्चा है मनुष्य-मन के कई प्रश्नों पर:
  • चित्त कैसे स्वतंत्र हो?
  • सत्य शास्त्रों में नहीं, तो कहां है?
  • पाप क्या है? क्या है उसका मूल?
  • अंतःसंघर्ष को कैसे मिटाएं?

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    पुस्तकें - विवरण सामग्री तालिका
     
    OSHO Media International
    168
    978-81-7261-180-4
        अनुक्रम
        #1: जिज्ञासा और अभीप्सा
        #2: आनंद की सुगंध प्रेम है
        #3: ध्यान क्या है
        #4: जीवन-परिवर्तन की दिशा
        #5: चित्त की स्वतंत्रता
        #6: चित्त की सरलता
        #7: समाधि सत्य का द्वार है
        #8: चित्त की शून्यता
     
     
    मूल्य सूची: रु. 60.00
     
    उद्धरण: अमृत की दिशा,दूसरा प्रवचन
    "हम यदि उत्सुक हैं, और यदि हम चाहते हैं कि सत्य का कोई अनुभव हो...और मैं आपको यह कहूं कि जो व्यक्ति सत्य के अनुभव को उपलब्ध नहीं होगा, उसके जीवन में न तो संगीत होता है, न उसके जीवन में शांति होती है, न उसके जीवन में कोई आनंद होता है। ये इतने लोग दिखाई पड़ते हैं--अभी रास्ते से मैं आया, और हजारों रास्तों से निकलना हुआ है, लाखों लोगों के चेहरे दिखाई पड़ते हैं--पर कोई चेहरा ऐसा दिखाई नहीं पड़ता कि उसके भीतर संगीत का अनुमान होता हो। कोई आंखें ऐसी दिखाई नहीं पड़तीं कि भीतर कोई शांति हो। कोई भाव ऐसे प्रदर्शित नहीं होते कि भीतर आलोक का और प्रकाश का अनुभव हुआ हो। हम जीते हैं--इस जीवन में कोई आनंद, इस जीवन में कोई शांति और कोई संगीत अनुभव नहीं होता।

    सारी दुनिया इस तरह के विसंगीत से भर गई है, सारी दुनिया के लोग ऐसी पीड़ा और संताप से भर गए हैं कि उन्हें ऐसा प्रतीत होने लगा है, जो ज्यादा विचारशील हैं उन्हें दिखाई पड़ता है कि इस जीवन का तो कोई अर्थ नहीं है, इससे तो मर जाना बेहतर है। और बहुत से लोगों ने पिछले पचास वर्षों में, बहुत विचारशील लोगों ने आत्महत्याएं की हैं। वे लोग नासमझ नहीं थे जिन्होंने अपने को समाप्त किया है।

    जीवन की यह जो स्थिति है, आज जीवन की यह जो परिणति है, आज जीवन का यह जो दुख और पीड़ा है, इसे देख कर कोई भी अपने को समाप्त कर लेना चाहेगा। ऐसी स्थिति में केवल नासमझ जी सकते हैं। ऐसी पीड़ा और तनाव को केवल अज्ञानी झेल सकते हैं। जिसे थोड़ा भी बोध होगा, वह अपने को समाप्त कर लेना चाहेगा। इसका तो अर्थ यह हुआ कि जिनको बोध होगा, वे आत्महत्या कर लेंगे?

    लेकिन महावीर ने और बुद्ध ने आत्महत्या नहीं की। और क्राइस्ट ने आत्महत्या नहीं की। कनफ्यूशियस ने और लाओत्से ने आत्महत्या नहीं की। दुनिया में ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने आत्महत्या के अतिरिक्त एक और मार्ग सोचा और जाना। मनुष्य के सामने दो ही विकल्प हैं--या तो आत्महत्या है, या आत्मसाधना है।"—ओशो
     

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