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चित चकमक लागै नहीं - पुस्तकें

 

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चित चकमक लागै नहीं - Chit Chakmak Lage Nahin

जीवन की खोज पर मलाड, मुंबई में प्रश्नोत्तर सहित हुई प्रवचनमाला के अंतर्गत ओशो द्वारा दिए गए छह प्रवचन

"विचार समझ से महत्वपूर्ण हो गए हैं, क्योंकि बहुत ममत्व हमने उनको दिया है। इस ममत्व को एकदम तोड़ देना जरूरी है। और तोड़ना कठिन नहीं है, क्योंकि यह बिलकुल काल्पनिक है। यह जंजीर कहीं है नहीं, केवल कल्पना में है। विचार के प्रति ममत्व का त्याग जरूरी है।
पहली बात: विचार के प्रति अपरिग्रह का बोध।
दूसरी बात: विचार के प्रति ममत्व का त्याग।
और तीसरी बात: विचार के प्रति तटस्थ साक्षी की स्थिति।"—ओशो
पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:
  • जीवन की खोज और मृत्यु का बोध
  • क्या हमारे मन स्वतंत्र हैं या परतंत्र?
  • कहां है इस सारे जगत का जीवन स्रोत?
  • निर्विचार द्वार है सत्य का


  •  
     
    पुस्तकें - विवरण सामग्री तालिका
     
    OSHO Media International
    124
    978-81-7261-268-9
        अनुक्रम
        #1: जीवन की खोज
        #2: अविचार
        #3: स्वतंत्रता और आत्म-क्रांति
        #4: विचार
        #5: विचार: एक आत्मानुभूति
        #6: निर्विचार
     
     
    मूल्य सूची: रु. 85.00
     
    उद्धरण: चित चकमक लागै नहीं, पहला प्रवचन
    "जीवन एक अवसर है। और जितने क्षण हम खो देते हैं उन्हें वापस पाने का कोई भी उपाय नहीं है। और जीवन एक अवसर है उसे हम किसी भी भांति, किसी भी रूप में परिवर्तित कर सकते हैं। जो भी हम उसके साथ करते हैं, जीवन परिवर्तित हो जाता है। कुछ लोग उसे संपत्ति में परिवर्तित कर लेते हैं। जीवन भर, जीवन के सारे अवसर को, सारी शक्ति को संपत्ति में परिवर्तित कर लेते हैं। लेकिन मौत जब सामने खड़ी होती है, संपत्ति व्यर्थ हो जाती है। कुछ लोग जीवन भर श्रम करके जीवन के अवसर को यश में, कीर्ति में परिणित कर लेते हैं। यश होता है, कीर्ति होती है, अहंकार की तृप्ति होती है। लेकिन मौत जब सामने खड़ी होती है, अहंकार और यश और कीर्ति सब व्यर्थ हो जाते हैं।

    कसौटी क्या है कि आपका जीवन व्यर्थ नहीं गया?

    कसौटी एक ही है कि मौत जब सामने खड़ी हो, तो जो आपने जीवन में कमाया हो, वह व्यर्थ न हो जाए। आपने जीवन के अवसर को जिस चीज में परिवर्तित किया हो, सारे जीवन को जिस दांव पर लगाया हो, जब मौत सामने खड़ी हो तो वह व्यर्थ न हो जाए, उसकी सार्थकता बनी रहे।

    मृत्यु के समक्ष जो सार्थक है वही वस्तुतः सार्थक है, शेष सब व्यर्थ है। मैं पुनः दोहराता हूं: मृत्यु के समक्ष जो सार्थक है वही बस सार्थक है, शेष सब व्यर्थ है।

    यह बहुत कम लोगों के स्मरण में है--यह कसौटी, यह मूल्यांकन, यह दृष्टि, बहुत कम लोगों के समक्ष है। आपके समक्ष है या नहीं, इसे सोचने का निवेदन करता हूं। इसे थोड़ा विचार करेंगे कि मैं जीवन भर दौड़ कर जो भी इकट्ठा कर लूंगा, जो भी--चाहे पांडित्य इकट्ठा कर लूंगा, चाहे धन इकट्ठा कर लूंगा, चाहे बहुत उपवास करके तपश्चर्या इकट्ठी कर लूंगा, या बहुत यश कमा लूंगा, या कुछ किताबें लिख लूंगा, या कुछ चित्र बना लूंगा, या कुछ गीत गा लूंगा, लेकिन अंततः जब मेरा सारा जीवन अंतिम कसौटी पर खड़ा होगा, तो मृत्यु के समक्ष इनकी कोई सार्थकता होगी या नहीं होगी?

    अगर नहीं होगी, तो आज ही सचेत हो जाना उचित है। और उस दिशा में संलग्न हो जाना भी उचित है कि मैं कुछ ऐसी संपदा भी खड़ी कर सकूं और कोई ऐसी शक्ति भी निर्मित कर सकूं और प्राणों के भीतर कोई ऐसी ऊर्जा को जन्म दे सकूं कि जब मौत समक्ष हो तब मेरे भीतर कुछ हो जो मौत से बच जाता हो, मौत जिसे नष्ट न कर पाती हो।"—ओशो
    "जीवन एक अवसर है। और जितने क्षण हम खो देते हैं उन्हें वापस पाने का कोई भी उपाय नहीं है। और जीवन एक अवसर है उसे हम किसी भी भांति, किसी भी रूप में परिवर्तित कर सकते हैं। जो भी हम उसके साथ करते हैं, जीवन परिवर्तित हो जाता है। कुछ लोग उसे संपत्ति में परिवर्तित कर लेते हैं। जीवन भर, जीवन के सारे अवसर को, सारी शक्ति को संपत्ति में परिवर्तित कर लेते हैं। लेकिन मौत जब सामने खड़ी होती है, संपत्ति व्यर्थ हो जाती है। कुछ लोग जीवन भर श्रम करके जीवन के अवसर को यश में, कीर्ति में परिणित कर लेते हैं। यश होता है, कीर्ति होती है, अहंकार की तृप्ति होती है। लेकिन मौत जब सामने खड़ी होती है, अहंकार और यश और कीर्ति सब व्यर्थ हो जाते हैं।

    कसौटी क्या है कि आपका जीवन व्यर्थ नहीं गया?

    कसौटी एक ही है कि मौत जब सामने खड़ी हो, तो जो आपने जीवन में कमाया हो, वह व्यर्थ न हो जाए। आपने जीवन के अवसर को जिस चीज में परिवर्तित किया हो, सारे जीवन को जिस दांव पर लगाया हो, जब मौत सामने खड़ी हो तो वह व्यर्थ न हो जाए, उसकी सार्थकता बनी रहे।

    मृत्यु के समक्ष जो सार्थक है वही वस्तुतः सार्थक है, शेष सब व्यर्थ है। मैं पुनः दोहराता हूं: मृत्यु के समक्ष जो सार्थक है वही बस सार्थक है, शेष सब व्यर्थ है।

    यह बहुत कम लोगों के स्मरण में है--यह कसौटी, यह मूल्यांकन, यह दृष्टि, बहुत कम लोगों के समक्ष है। आपके समक्ष है या नहीं, इसे सोचने का निवेदन करता हूं। इसे थोड़ा विचार करेंगे कि मैं जीवन भर दौड़ कर जो भी इकट्ठा कर लूंगा, जो भी--चाहे पांडित्य इकट्ठा कर लूंगा, चाहे धन इकट्ठा कर लूंगा, चाहे बहुत उपवास करके तपश्चर्या इकट्ठी कर लूंगा, या बहुत यश कमा लूंगा, या कुछ किताबें लिख लूंगा, या कुछ चित्र बना लूंगा, या कुछ गीत गा लूंगा, लेकिन अंततः जब मेरा सारा जीवन अंतिम कसौटी पर खड़ा होगा, तो मृत्यु के समक्ष इनकी कोई सार्थकता होगी या नहीं होगी?

    अगर नहीं होगी, तो आज ही सचेत हो जाना उचित है। और उस दिशा में संलग्न हो जाना भी उचित है कि मैं कुछ ऐसी संपदा भी खड़ी कर सकूं और कोई ऐसी शक्ति भी निर्मित कर सकूं और प्राणों के भीतर कोई ऐसी ऊर्जा को जन्म दे सकूं कि जब मौत समक्ष हो तब मेरे भीतर कुछ हो जो मौत से बच जाता हो, मौत जिसे नष्ट न कर पाती हो।"—ओशो
    "जीवन एक अवसर है। और जितने क्षण हम खो देते हैं उन्हें वापस पाने का कोई भी उपाय नहीं है। और जीवन एक अवसर है उसे हम किसी भी भांति, किसी भी रूप में परिवर्तित कर सकते हैं। जो भी हम उसके साथ करते हैं, जीवन परिवर्तित हो जाता है। कुछ लोग उसे संपत्ति में परिवर्तित कर लेते हैं। जीवन भर, जीवन के सारे अवसर को, सारी शक्ति को संपत्ति में परिवर्तित कर लेते हैं। लेकिन मौत जब सामने खड़ी होती है, संपत्ति व्यर्थ हो जाती है। कुछ लोग जीवन भर श्रम करके जीवन के अवसर को यश में, कीर्ति में परिणित कर लेते हैं। यश होता है, कीर्ति होती है, अहंकार की तृप्ति होती है। लेकिन मौत जब सामने खड़ी होती है, अहंकार और यश और कीर्ति सब व्यर्थ हो जाते हैं।

    कसौटी क्या है कि आपका जीवन व्यर्थ नहीं गया?

    कसौटी एक ही है कि मौत जब सामने खड़ी हो, तो जो आपने जीवन में कमाया हो, वह व्यर्थ न हो जाए। आपने जीवन के अवसर को जिस चीज में परिवर्तित किया हो, सारे जीवन को जिस दांव पर लगाया हो, जब मौत सामने खड़ी हो तो वह व्यर्थ न हो जाए, उसकी सार्थकता बनी रहे।

    मृत्यु के समक्ष जो सार्थक है वही वस्तुतः सार्थक है, शेष सब व्यर्थ है। मैं पुनः दोहराता हूं: मृत्यु के समक्ष जो सार्थक है वही बस सार्थक है, शेष सब व्यर्थ है।

    यह बहुत कम लोगों के स्मरण में है--यह कसौटी, यह मूल्यांकन, यह दृष्टि, बहुत कम लोगों के समक्ष है। आपके समक्ष है या नहीं, इसे सोचने का निवेदन करता हूं। इसे थोड़ा विचार करेंगे कि मैं जीवन भर दौड़ कर जो भी इकट्ठा कर लूंगा, जो भी--चाहे पांडित्य इकट्ठा कर लूंगा, चाहे धन इकट्ठा कर लूंगा, चाहे बहुत उपवास करके तपश्चर्या इकट्ठी कर लूंगा, या बहुत यश कमा लूंगा, या कुछ किताबें लिख लूंगा, या कुछ चित्र बना लूंगा, या कुछ गीत गा लूंगा, लेकिन अंततः जब मेरा सारा जीवन अंतिम कसौटी पर खड़ा होगा, तो मृत्यु के समक्ष इनकी कोई सार्थकता होगी या नहीं होगी?

    अगर नहीं होगी, तो आज ही सचेत हो जाना उचित है। और उस दिशा में संलग्न हो जाना भी उचित है कि मैं कुछ ऐसी संपदा भी खड़ी कर सकूं और कोई ऐसी शक्ति भी निर्मित कर सकूं और प्राणों के भीतर कोई ऐसी ऊर्जा को जन्म दे सकूं कि जब मौत समक्ष हो तब मेरे भीतर कुछ हो जो मौत से बच जाता हो, मौत जिसे नष्ट न कर पाती हो।"—ओशो
    "जीवन एक अवसर है। और जितने क्षण हम खो देते हैं उन्हें वापस पाने का कोई भी उपाय नहीं है। और जीवन एक अवसर है उसे हम किसी भी भांति, किसी भी रूप में परिवर्तित कर सकते हैं। जो भी हम उसके साथ करते हैं, जीवन परिवर्तित हो जाता है। कुछ लोग उसे संपत्ति में परिवर्तित कर लेते हैं। जीवन भर, जीवन के सारे अवसर को, सारी शक्ति को संपत्ति में परिवर्तित कर लेते हैं। लेकिन मौत जब सामने खड़ी होती है, संपत्ति व्यर्थ हो जाती है। कुछ लोग जीवन भर श्रम करके जीवन के अवसर को यश में, कीर्ति में परिणित कर लेते हैं। यश होता है, कीर्ति होती है, अहंकार की तृप्ति होती है। लेकिन मौत जब सामने खड़ी होती है, अहंकार और यश और कीर्ति सब व्यर्थ हो जाते हैं।

    कसौटी क्या है कि आपका जीवन व्यर्थ नहीं गया?

    कसौटी एक ही है कि मौत जब सामने खड़ी हो, तो जो आपने जीवन में कमाया हो, वह व्यर्थ न हो जाए। आपने जीवन के अवसर को जिस चीज में परिवर्तित किया हो, सारे जीवन को जिस दांव पर लगाया हो, जब मौत सामने खड़ी हो तो वह व्यर्थ न हो जाए, उसकी सार्थकता बनी रहे।

    मृत्यु के समक्ष जो सार्थक है वही वस्तुतः सार्थक है, शेष सब व्यर्थ है। मैं पुनः दोहराता हूं: मृत्यु के समक्ष जो सार्थक है वही बस सार्थक है, शेष सब व्यर्थ है।

    यह बहुत कम लोगों के स्मरण में है--यह कसौटी, यह मूल्यांकन, यह दृष्टि, बहुत कम लोगों के समक्ष है। आपके समक्ष है या नहीं, इसे सोचने का निवेदन करता हूं। इसे थोड़ा विचार करेंगे कि मैं जीवन भर दौड़ कर जो भी इकट्ठा कर लूंगा, जो भी--चाहे पांडित्य इकट्ठा कर लूंगा, चाहे धन इकट्ठा कर लूंगा, चाहे बहुत उपवास करके तपश्चर्या इकट्ठी कर लूंगा, या बहुत यश कमा लूंगा, या कुछ किताबें लिख लूंगा, या कुछ चित्र बना लूंगा, या कुछ गीत गा लूंगा, लेकिन अंततः जब मेरा सारा जीवन अंतिम कसौटी पर खड़ा होगा, तो मृत्यु के समक्ष इनकी कोई सार्थकता होगी या नहीं होगी?

    अगर नहीं होगी, तो आज ही सचेत हो जाना उचित है। और उस दिशा में संलग्न हो जाना भी उचित है कि मैं कुछ ऐसी संपदा भी खड़ी कर सकूं और कोई ऐसी शक्ति भी निर्मित कर सकूं और प्राणों के भीतर कोई ऐसी ऊर्जा को जन्म दे सकूं कि जब मौत समक्ष हो तब मेरे भीतर कुछ हो जो मौत से बच जाता हो, मौत जिसे नष्ट न कर पाती हो।"—ओशो
    "जीवन एक अवसर है। और जितने क्षण हम खो देते हैं उन्हें वापस पाने का कोई भी उपाय नहीं है। और जीवन एक अवसर है उसे हम किसी भी भांति, किसी भी रूप में परिवर्तित कर सकते हैं। जो भी हम उसके साथ करते हैं, जीवन परिवर्तित हो जाता है। कुछ लोग उसे संपत्ति में परिवर्तित कर लेते हैं। जीवन भर, जीवन के सारे अवसर को, सारी शक्ति को संपत्ति में परिवर्तित कर लेते हैं। लेकिन मौत जब सामने खड़ी होती है, संपत्ति व्यर्थ हो जाती है। कुछ लोग जीवन भर श्रम करके जीवन के अवसर को यश में, कीर्ति में परिणित कर लेते हैं। यश होता है, कीर्ति होती है, अहंकार की तृप्ति होती है। लेकिन मौत जब सामने खड़ी होती है, अहंकार और यश और कीर्ति सब व्यर्थ हो जाते हैं।

    कसौटी क्या है कि आपका जीवन व्यर्थ नहीं गया?

    कसौटी एक ही है कि मौत जब सामने खड़ी हो, तो जो आपने जीवन में कमाया हो, वह व्यर्थ न हो जाए। आपने जीवन के अवसर को जिस चीज में परिवर्तित किया हो, सारे जीवन को जिस दांव पर लगाया हो, जब मौत सामने खड़ी हो तो वह व्यर्थ न हो जाए, उसकी सार्थकता बनी रहे।

    मृत्यु के समक्ष जो सार्थक है वही वस्तुतः सार्थक है, शेष सब व्यर्थ है। मैं पुनः दोहराता हूं: मृत्यु के समक्ष जो सार्थक है वही बस सार्थक है, शेष सब व्यर्थ है।

    यह बहुत कम लोगों के स्मरण में है--यह कसौटी, यह मूल्यांकन, यह दृष्टि, बहुत कम लोगों के समक्ष है। आपके समक्ष है या नहीं, इसे सोचने का निवेदन करता हूं। इसे थोड़ा विचार करेंगे कि मैं जीवन भर दौड़ कर जो भी इकट्ठा कर लूंगा, जो भी--चाहे पांडित्य इकट्ठा कर लूंगा, चाहे धन इकट्ठा कर लूंगा, चाहे बहुत उपवास करके तपश्चर्या इकट्ठी कर लूंगा, या बहुत यश कमा लूंगा, या कुछ किताबें लिख लूंगा, या कुछ चित्र बना लूंगा, या कुछ गीत गा लूंगा, लेकिन अंततः जब मेरा सारा जीवन अंतिम कसौटी पर खड़ा होगा, तो मृत्यु के समक्ष इनकी कोई सार्थकता होगी या नहीं होगी?

    अगर नहीं होगी, तो आज ही सचेत हो जाना उचित है। और उस दिशा में संलग्न हो जाना भी उचित है कि मैं कुछ ऐसी संपदा भी खड़ी कर सकूं और कोई ऐसी शक्ति भी निर्मित कर सकूं और प्राणों के भीतर कोई ऐसी ऊर्जा को जन्म दे सकूं कि जब मौत समक्ष हो तब मेरे भीतर कुछ हो जो मौत से बच जाता हो, मौत जिसे नष्ट न कर पाती हो।"—ओशो
     

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