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ध्‍यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्‍ति - पुस्तकें

 

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ध्‍यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्‍ति – Dhyanyog: Pratham Aur Antim Mukti

ओशो द्वारा ध्यान एवं ध्यान प्रयोगों पर दिये गए प्रवचनोंका अंशरूप संकलन।

इक्कीसवीं सदी का जीवन जितनी तेज गति से भाग रहा है, उतनी ही तेज गति से व्यक्ति के लिए तनाव बढ़ता जा रहा है। शांत बैठकर ध्यान में उतर जाना अब उतना सरल नहीं है जितना कि बुद्ध के समय में था।
‘ ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति’ ओशो द्वारा सृजित अनेक ध्यान विधियों का विस्तृत व प्रायोगिक विवरण है, विशेषतः ओशो सक्रिय ध्यान विधियों व ओशो मेडिटेटिव थेरेपीज़ का, जो कि आधुनिक जीवन के तनावों से सीधे निपटती हैं व हमें ताजा व ऊर्जावान कर जाती हैं। ओशो बहुत सी प्राचीन विधियों की भी चर्चा करते हैं: विपस्सना व झाझेन, केंद्रीकरण की विधियां, प्रकाश व अंधकार पर ध्यान, हृदय के विकास की विधियां...।
साथ ही ओशो ध्यान संबंधी प्रश्नों के उत्तर भी देते हैं व हमें बताते हैं कि ध्यान क्या है, कैसे ध्यान करना शुरू करें। और कैसे अपनी अंतर-यात्रा को निर्बाध रूप से जारी रख सकें।
"ध्यान की शुरुआत तो है, पर उसका कोई अंत नहीं है। वह अंनत तक अनवरत चलता चला जाता है। मन तो छोटी सी चीज है, ध्यान तुम्हें पूरे अस्तित्व का हिस्सा बना देता है। यह तुम्हें स्वतंत्रता देता है कि तुम पूर्ण के साथ एक हो जाओ।"—ओशो
 
 
पुस्तकें - Details सामग्री तालिका
 
OSHO Media International
332
978-81-7261-029-6
    अनुक्रम
    #1: ध्यान क्या है?
    #2: ध्यान की खिलावट
    #3: विधियां और ध्यान
    #4: साधकों के लिए प्रारंभिक सुझाव
    #5: सक्रिय ध्यान
    #6: “मिस्टिक रोज़” ध्यान
    #7: “नो-माइंड” ध्यान
    #8: “बॉर्न अगेन”
    #9: नटराज ध्यान
    #10: व्हिरलिंग ध्यान
    #11: दौड़ना, जॉगिंग और तैरना
    #12: हंसना ध्यान
    #13: धूम्रपान ध्यान
    #14: विपस्सना
    #15: प्रार्थना ध्यान
    #16: अनुभव करो—‘मैं' हूं,'मैं' कौन हूं?
    #17: अंतर्दर्शन ध्यान
    #18: ऊर्जा का अंतर्वृत्त
    #19: स्वर्णिम प्रकाश ध्यान
    #20: प्रकाश का हृदय
    #21: सूक्ष्म शरीर को देखना
    #22: आलो‍कमयी उपस्थि‍ति
    #23: अंधकार पर ध्यान
    #24: ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी करना
    #25: नादब्रह्म ध्यान
    #26: ओम्-ॐ
    #27: देववाणी
    #28: जेट-सेट के लिए एक ध्यान
    #29: मृत्यु में प्रवेश
    #30: गौरीशंकर ध्यान
    #31: मंडल ध्यान
    #32: पंख की भांति छूना
    #33: नासाग्र को देखना
    #34: झाझेन
    #35: झेन की हंसी
    #36: संभोग में कंपना
    #37: ध्यान में बाधाएं
    #38: झूठी विधियां
    #39: मन की चालबाजियां
    #40: ओशो से प्रश्नोत्तर
 
 
List Price: रु. 240.00
 
उद्धरण: ध्‍यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्‍ति, 'कुछ भी ध्यान बन सकता है'|

"कुछ भी ध्यान बन सकता है।"

"यही राज है: अ-यंत्रवत होना। यदि हम अपने कृत्यों को अ-यंत्रवत कर सकें, तो पूरा जीवन एक ध्यान बन जाता है। फिर कोई भी छोटा-मोटा काम--नहाना, भोजन करना, मित्र से बात करना--ध्यान बन जाता है। ध्यान एक गुण है; उसे किसी भी चीज में लाया जा सकता है। वह कोई विशेष कृत्य नहीं है। लोग इसी प्रकार सोचते हैं, वे सोचते हैं ध्यान कोई विशेष कृत्य है--कि जब तुम पूर्व की ओर मुंह करके बैठो, कुछ मंत्र दोहराओ, थोड़ी धूपबत्ती जलाओ, कि किसी निश्चित समय पर, निश्चित तरह से, निश्चित मुद्रा में कुछ करो। ध्यान का उस सब से कुछ लेना-देना नहीं है। वे सब तुम्हें यंत्रवत करने के उपाय हैं और ध्यान यंत्रवत होने के विपरीत है।

तो यदि तुम सजग रह सको, तो कोई भी कृत्य ध्यान है; कोई भी कृत्य तुम्हें अपूर्व रूप से सहयोगी होगा।"—ओशो

 

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