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मैं धार्मिकता सिखाता हूं धर्म नहीं - पुस्तकें

 

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मैं धार्मिकता सिखाता हूं धर्म नहीं - Main Dharmikta Sikhata Hoon Dharm Nahin

हमारे युग के सर्वाधिक मौलिक क्रांतिद्रष्टा ओशो की आधारभूत देशना ‘धर्म नहीं धार्मिकता’ पर दिए गए २२ प्रवचनांशों का एक अप्रतिम संकलन।

"मेरी दृष्टि में तो धर्म एक गुण है, गुणवत्ता है; कोई संगठन नहीं, संप्रदाय नहीं। ये सारे धर्म जो दुनिया में हैं—और उनकी संख्या कम नहीं है, पृथ्वी पर कोई तीन सौ धर्म हैं—वे सब मुर्दा चट्टानें हैं। वे बहते नहीं, वे बदलते नहीं, वे समय के साथ-साथ चलते नहीं। और स्मरण रहे कि कोई चीज जो स्वयं निष्प्राण है, तुम्हारे किसी काम आने वाली नहीं। हां, अगर तुम उनसे अपनी कब्र ही निर्मित करना चाहो तो अलग बात है, शायद फिर वे पत्थर उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
धार्मिकता तुम्हारे हृदय की खिलावट है। वह तो स्वयं की आत्मा के, अपनी ही सत्ता के केंद्र बिंदु तक पहुंचने का नाम है। और जिस क्षण तुम अपने अस्तित्व के ठीक केंद्र पर पहुंच जाते हो, उस क्षण सौंदर्य का, आनंद का, शांति का और आलोक का विस्फोट होता है। तुम एक सर्वथा भिन्न व्यक्ति होने लगते हो। तुम्हारे जीवन में जो अंधेरा था वह तिरोहित हो जाता है, और जो भी गलत था वह विदा हो जाता है। फिर तुम जो भी करते हो वह परम सजगता और पूर्ण समग्रता के साथ होता है।"—ओशो
 
 
पुस्तकें - विवरण सामग्री तालिका
 
OSHO Media International
136
978-81-7261-049-4
    अनुक्रम
    #1: भाग-1 : धर्म नहीँ है धर्मोँ मेँ
    प्रवचन 1: धर्मोँ की मृत चट्टानेँ :धार्मिकता की बह्ती सरिता
    प्रवचन 2: मन की बचकानी माँगोँ को-धर्मोँ ने पकडाए खिलौने
    प्रवचन 3: ईश्वर और शैतान:बिलकुल सटिक जोडी
    प्रवचन 4: काल्पनिक समस्या: कल्पित समाधान
    प्रवचन 5: ईश्वर:विकलाँग मानसिकता के लिए एक ज़ूठी बैसाखी
    प्रवचन 6: स्वार्थ के बीज: परार्थ के फूल
    प्रवचन 7: देह और आत्मा के बीच चीन की दिवार
    प्रवचन 8: तथाकथित प्रार्थनाएँ: ईश्वर के नाम सलाहेँ व शिकायतेँ
    प्रवचन 9: मैँ जागरण सिखाता हूँ, आचरण नहीँ
    प्रवचन 10: मैँ रूपाँतरण सिखाता हूँ, दमन नहीँ
    प्रवचन 11: विकृतियोँ का मूलस्त्रोत: अप्राकृतिक काम-दमन
    प्रवचन 12: धर्मोँ की सँगठित अपराध-व्यवस्था
    प्रवचन 13: मैँ आत्मग्यान सिखाता हूँ, अनुशासन नहीँ
    #2: भाग-2 : धार्मिकता अर्थात जीवन की कला : होश और हास्य, आनँद-अहोभाव-महोत्सव
    प्रवचन 1: ईदन के उधान मेँ पुन:प्रवेश
    प्रवचन 2: मैँ आह्लाद सिखाता हूँ, विषाद नहीँ
    प्रवचन 3: मैँ जीवन-प्रेम सिखाता हूँ, मृत्यु-पूजा नहीँ
    प्रवचन 4: ध्यान की आबोहवा: प्रेम के फूल
    प्रवचन 5: हास्य मेँ भगवत्ता की ज़लक
    प्रवचन 6: जागो-और मुक्त हो जाओ
    प्रवचन 7: एकाग्रता:मन का अनुशासन, ध्यान:मन का विसर्जन
    प्रवचन 8: सँबोधि तुम्हारा स्वभाव है
    प्रवचन 9: मौन का रसास्वादन: धार्मिकता की अनुभूति
 
 
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उद्धरण: मैं धार्मिकता सिखाता हूं धर्म नहीं, भाग २—मैं आल्हाद सिखाता हूँ, विषाद नहीं
"मेरी दृष्टि में वही व्यक्ति प्रामाणिक रूप से धार्मिक है, जो जीवन के प्रति समादरपूर्ण है; न कि वे लोग जो प्रति रविवार चर्च चले जाते हैं; अथवा मंदिर, मस्जिद, या सिनागॉग हो आते हैं। बिना आत्म-रूपांतरण की प्रक्रिया से गुजरे, बगैर कुछ दांव पर लगाए, धर्म का सौदा बड़े सस्ते में कर के, वे लोग स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं। उन्होंने सुंदर-सुंदर खिलौनों से खेलने का इंतजाम कर लिया है--परमात्मा की मूर्तियां, स्वर्ग से अवतरित शास्त्र, ईश्वर के पैगाम लेकर आने वाले पैगंबर और अवतार, जो हमारे द्वारा ही कल्पित हैं; क्योंकि यह खयाल मात्र ही हमें बड़ी तसल्ली देता है, प्रीतिकर लगता है कि परमात्मा हमारी फिकर रखता है, और हमारे लिए पैगाम भेजता है।

अपने अहंकार की वजह से ही हमने इन अवतारों और पैगंबरों पर विश्वास किया है। अहंकार के कारण ही हमने ईश्वर में भरोसा किया है कि ईश्वर ने मनुष्य की रचना की, और उसने अपनी ही शक्ल में मनुष्य को बनाया। उसने मनुष्य का निर्माण ऐसे किया जैसे मनुष्य उसकी सृजनात्मकता की परम पराकाष्ठा हो, इसके बाद फिर उसने कुछ और सृजन नहीं किया। यह उसकी अंतिम कृति है। इसके पश्चात उसने अवकाश ग्रहण कर लिया, रिटायर हो गया।

मेरे लिए यह बिलकुल ही भिन्न अर्थ रखता है। आदमी यह मानता है कि वह ईश्वर की कृति है, क्योंकि यह मान्यता उसके अहं को बहुत पुष्ट करती है कि ‘‘मैं कोई ऐरा-गैरा, कोई साधारण व्यक्ति नहीं, वरन परमात्मा की रचना हूं।’’

परंतु मेरी दृष्टि में परमात्मा का विचार ही बड़ा बेहूदा है; और यह खयाल कि उसने मनुष्य की सृष्टि की, मनुष्य को एक कठपुतली मात्र बना देता है।....

ईश्वर ने मनुष्य की रचना की, इस समूची धारणा ने जीवन का सौंदर्य और आनंद छीन कर तुम्हें मशीनों में बदल डाला है। मैं तुम्हारे जीवन से ईश्वर को विदा करना चाहता हूं ताकि तुम पहली बार स्वयं को आत्म-निर्भर एवं स्वतंत्र महसूस कर सको; किसी के द्वारा निर्मित कठपुतली की भांति नहीं, वरन जीवन के शाश्वत स्रोत की तरह स्वयं को अनुभव कर सको। केवल तभी तुम प्रफुल्लित हो सकते हो।"—ओशो