ग्रंथ
- also available as a ऑडियोपुस्तकें Series

मैं कहता आंखन देखी - पुस्तकें

 

Availability: In stock

रु. 180.00
मोल  

मैं कहता आंखन देखी - Main Kahta Aankhan Dekhi

ओशो द्वारा वुडलैंड, बंबई में दिए गए चार आत्मकथात्मक प्रश्नोत्तर प्रवचनों का अपूर्व संकलन।

ओशो की इस बहुचर्चित पुस्तक में ओशो उत्तर देते हैं उन महत्वपूर्ण प्रश्नों के जो उनसे पूछे गए हैं उनके कार्य के संबंध में, मनुष्यता के इस निर्णायक मोड़ पर उनके आगमन व उनके योगदान के संबंध में।
पुस्तक के अन्य विषय बिंदु:
  • सत्य
  • चिन्मय कौन?
  • अजन्मा क्या?
  • धर्म


  •  
     
    पुस्तकें - विवरण सामग्री तालिका
     
    OSHO Media International
    140
    978-81-7261-245-0
        अनुक्रम
        #1: सत्य सार्वभौम है
        #2: चिन्मय कौन? अजन्मा क्या?
        #3: आकाश जैसा शाश्वत है सत्य
        #4: धर्म की गति और तेज हो!
     
     
    मूल्य सूची: रु. 180.00
     
    उद्धरण: मैं कहता आंखन देखी, तीसरा प्रवचन

    "मेरी दृष्टि में भविष्य का जो धर्म है, कल जिस बात का प्रभाव होने वाला है, जिससे लोग मार्ग लेंगे और जिससे लोग चलेंगे; वह है--सनातन, इटर्नल का आग्रह। हम जो कह रहे हैं; वह न नया है, न पुराना है। न वह कभी पुराना होगा और न उसे कभी कोई नया कर सकता है। हां, जिन्होंने 'पुराना' कह कर उसे कहा था उनके पास पुराने शब्द थे, जिन्होंने 'नया' कह कर उसे कहा उनके पास नये शब्द हैं। और हम शब्द का आग्रह छोड़ते हैं।

    इसलिए मैं सभी परंपराओं के शब्दों का उपयोग करता हूं, जो शब्द समझ में आ जाए। कभी पुराने की भी बात करता हूं, शायद पुराने से किसी को समझ में आ जाए। कभी नये की भी बात करता हूं, शायद नये से किसी को समझ में आ जाए। और साथ ही यह भी निरंतर स्मरण दिलाते रहना चाहता हूं कि नया और पुराना सत्य नहीं होता। सत्य आकाश की तरह शाश्वत है। उसमें वृक्ष लगते हैं आकाश में, खिलते हैं, फूल आते हैं। वृक्ष गिर जाते हैं। वृक्ष पुराने, बूढ़े हो जाते हैं। वृक्ष बच्चे और जवान होते हैं--आकाश नहीं होता। एक बीज हमने बोया और अंकुर फूटा। अंकुर बिलकुल नया है, लेकिन जिस आकाश में फूटा, वह आकाश? फिर बड़ा हो गया वृक्ष। फिर जरा-जीर्ण होने लगा। मृत्यु के करीब आ गया वृक्ष। वृक्ष बूढ़ा है, लेकिन आकाश जिसमें वह हुआ है, वह आकाश बूढ़ा है? ऐसे कितने ही वृक्ष आए और गए, और आकाश अपनी जगह है--अछूता, निर्लेप।

    सत्य तो आकाश जैसा है। शब्द वृक्षों जैसे हैं। लगते हैं, अंकुरित होते हैं, पल्लवित होते हैं, खिल जाते हैं, मुर्झाते हैं, गिरते हैं, मरते हैं, जमीन में खो जाते हैं। आकाश अपनी जगह ही खड़ा रह जाता है! पुराने वालों का जोर भी शब्दों पर था और नये वालों का जोर भी शब्दों पर है। मैं शब्द पर जोर ही नहीं देना चाहता हूं। मैं तो उस आकाश पर जोर देना चाहता हूं जिसमें शब्द के फूल खिलते हैं, मरते हैं, खोते हैं--और आकाश बिलकुल ही अछूता रह जाता है, कहीं कोई रेखा भी नहीं छूट जाती।

    तो मेरी दृष्टि: सत्य, शाश्वत है--नये-पुराने से अतीत, ट्रांसेंडेंटल है। हम कुछ भी कहें और कुछ भी करें, हम उसे न नया करते हैं, न हम उसे पुराना करते हैं। जो भी हम कहेंगे, जो भी हम सोचेंगे, जो भी हम विचार निर्मित करेंगे, वे आएंगे और गिर जाएंगे। और सत्य अपनी जगह खड़ा रह जाएगा।"—ओशो

     

    Email this page to your friend