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मैं मृत्‍यु सिखाता हूं - पुस्तकें

 

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रु. 275.00
मोल  

मैं मृत्‍यु सिखाता हूं - Main Mrityu Sikhata Hun

ओशो द्वारा ध्‍यान, मृत्‍यु और समाधि पर दिए गए १५ अमृत प्रवचनों एवं ध्‍यान प्रयोगों का अपूर्व संकलन।

"समाधि में साधक मरता है स्वयं, और चूंकि वह स्वयं मृत्यु में प्रवेश करता है, वह जान लेता है इस सत्य को कि मैं हूं अलग, शरीर है अलग। और एक बार यह पता चल जाए कि मैं हूं अलग, मृत्यु समाप्त हो गई। और एक बार यह पता चल जाए कि मैं हूं अलग, और जीवन का अनुभव शुरू हो गया। मृत्यु की समाप्ति और जीवन का अनुभव एक ही सीमा पर होते हैं, एक ही साथ होते हैं। जीवन को जाना कि मृत्यु गई, मृत्यु को जाना कि जीवन हुआ। अगर ठीक से समझें तो ये एक ही चीज को कहने के दो ढंग हैं। ये एक ही दिशा में इंगित करने वाले दो इशारे हैं।"—ओशो
मृत्यु से अमृत की ओर ले चलने वाली इस पुस्तक के कुछ विषय बिंदु:
  • मृत्यु और मृत्यु-पार के रहस्य
  • सजग मृत्यु के प्रयोग
  • निद्रा, स्वप्न, सम्मोहन व मूर्च्छा के पार — जागृति
  • सूक्ष्म शरीर, ध्यान व तंत्र-साधना के गुप्त आयाम
  •  
     
    पुस्तकें - विवरण सामग्री तालिका
     
    OSHO Media International
    376
    978-81-7261-040-1
        अनुक्रम
        #1: आयोजित मृत्यु अर्थात ध्यान और समाधि के प्रायोगिक रहस्य
        #2: आध्यात्मिक विश्व आंदोलन—ताकि कुछ व्यक्ति प्रबुद्ध हो सकें
        #3: जीवन के मंदिर में द्वार है मृत्यु का
        #4: सजग मृत्यु और जाति-स्मरण के रहस्यों में प्रवेश
        #5: स्व है द्वार—सर्व का
        #6: निद्रा, स्वप्न, सम्मोहन और मूर्च्छा से जागृति की ओर
        #7: मूर्च्छा में मृत्यु है और जागृति में जीवन
        #8: विचार नहीं, वरन् मृत्यु के तथ्य का दर्शन
        #9: मैं मृत्यु सिखाता हूं
        #10: अंधकार से आलोक और मूर्च्छा से परम जागरण की ओर
        #11: संकल्पवान—हो जाता है आत्मवान
        #12: नाटकीय जीवन के प्रति साक्षी चेतना का जागरण
        #13: सूक्ष्म शरीर, ध्यान-साधना एवं तंत्र-साधना के कुछ गुप्त आयाम
        #14: धर्म की महायात्रा में स्वयं को दांव पर लगाने का साहस
        #15: संकल्प से साक्षी और साक्षी से आगे तथाता की परम उपलब्धि
     
     
    मूल्य सूची: रु. 265.00
     
    उद्धरण: मैं मृत्‍यु सिखाता हूं, पहला प्रवचन
    "मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आत्मा अमर नहीं है। मैं यह कह रहा हूं कि आत्मा की अमरता का सिद्धांत मौत से डरने वाले लोगों का सिद्धांत है। आत्मा की अमरता को जानना बिलकुल दूसरी बात है। और यह भी ध्यान रहे कि आत्मा की अमरता को वे ही जान सकते हैं, जो जीते जी मरने का प्रयोग कर लेते हैं। उसके अतिरिक्त कोई जानने का उपाय नहीं। इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है।

    मौत में होता क्या है? प्राणों की सारी ऊर्जा जो बाहर फैली हुई है, विस्तीर्ण है, वह वापस सिकुड़ती है, अपने केंद्र पर पहुंचती है। जो ऊर्जा प्राणों की सारे शरीर के कोने-कोने तक फैली हुई है, वह सारी ऊर्जा वापस सिकुड़ती है, बीज में वापस लौटती है।

    प्राणों की जो ऊर्जा फैली हुई है जीवन की, वह सिकुड़ती है, वापस लौटती है अपने केंद्र पर। नई यात्रा के लिए फिर बीज बनती है, फिर अणु बनती है। यह जो सिकुड़ाव है, इसी सिकुड़ाव से, इसी संकोच से पता चलता है कि मरा! मैं मरा! क्योंकि जिसे मैं जीवन समझता था, वह जा रहा है, सब छूट रहा है। हाथ-पैर शिथिल होने लगे, श्वास खोने लगी, आंखों ने देखना बंद कर दिया, कानों ने सुनना बंद कर दिया। ये तो सारी इंद्रियां, यह सारा शरीर किसी ऊर्जा के साथ संयुक्त होने के कारण जीवंत था। वह ऊर्जा वापस लौटने लगी। देह तो मुर्दा है, वह फिर मुर्दा रह गई। मृत्यु के इस क्षण में पता चलता है कि जा रहा हूं, डूब रहा हूं, समाप्त हो रहा हूं।

    और इस घबराहट के कारण कि मैं मर रहा हूं, यह इतनी ज्यादा चिंता पैदा कर देती है मन में कि वह उस मृत्यु के अनुभव को भी जानने से वंचित रह जाता है। जानने के लिए चाहिए शांति। हो जाता है इतना अशांत कि मृत्यु को जान नहीं पाता।

    नहीं, मरने के क्षण में नहीं जाना जा सकता है मौत को। लेकिन आयोजित मौत हो सकती है। आयोजित मौत को ही ध्यान कहते हैं, योग कहते हैं, समाधि कहते हैं। समाधि का एक ही अर्थ है कि जो घटना मृत्यु में अपने आप घटती है, समाधि में साधक चेष्टा और प्रयास से सारे जीवन की ऊर्जा को सिकोड़कर भीतर ले जाता है, जानते हुए।"—ओशो
     

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