ग्रंथ
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मैंने राम रतन धन पायो - पुस्तकें

 

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रु. 175.00
मोल  

मैंने राम रतन धन पायो - Maine Ram Ratan Dhan Payo

मीरा-वाणी पर प्रश्नोत्तर सहित पूना में ओशो द्वारा दिए गए दस अमृत प्रवचनों का अनुपम संकलन।

"आओ प्रेम की एक झील में नौका-विहार करें। और ऐसी झील मनुष्य के इतिहास में दूसरी नहीं है, जैसी झील मीरा है। मानसरोवर भी उतना स्वच्छ नहीं। और हंसों की ही गति हो सकेगी मीरा की इस झील में। हंस बनो, तो ही उतर सकोगे इस झील में। हंस न बने तो न उतर पाओगे।
हंस बनने का अर्थ है: मोतियों की पहचान आंख में हो, मोती की आकांक्षा हृदय में हो। हंसा तो मोती चुगे!
कुछ और से राजी मत हो जाना। क्षुद्र से जो राजी हो गया, वह विराट को पाने में असमर्थ हो जाता है। नदी-नालों का पानी पीने से जो तृप्त हो गया, वह मानसरोवरों तक नहीं पहुंच पाता; जरूरत ही नहीं रह जाती।
मीरा की इस झील में तुम्हें निमंत्रण देता हूं। मीरा नाव बन सकती है। मीरा के शब्द तुम्हें डूबने से बचा सकते हैं। उनके सहारे पर उस पार जा सकते हो।"—ओशो

 
 
पुस्तकें - विवरण सामग्री तालिका
 
OSHO Media International
320
978-81-7261-249-8
    अनुक्रम
    #1: प्रेम की झील में नौका-विहार
    #2: समाधि की अभिव्यक्तियां
    #3: मैं तो गिरधर के घर जाऊं
    #4: मृत्यु का वरण: अमृत का स्वाद
    #5: पद घुंघरू बांध मीरा नाची रे
    #6: श्रद्धा है द्वार प्रभु का
    #7: मैंने राम रतन धन पायो
    #8: दमन नहीं—ऊर्ध्वगमन
    #9: राम नाम रस पीजै मनुआं
    #10: फूल खिलता है अपनी निजता से
 
 
मूल्य सूची: रु. 175.00
 
उद्धरण: मैंने राम रतन धन पायो, पहला प्रवचन
"मीरा स्त्री है। स्त्री के लिए भक्ति ऐसे ही सुगम है जैसे पुरुष के लिए तर्क और विचार।

वैज्ञानिक कहते हैं: मनुष्य का मस्तिष्क दो हिस्सों में विभाजित है। बाईं तरफ जो मस्तिष्क है वह सोच-विचार करता है; गणित, तर्क, नियम, वहां सब श्रृंखलाबद्ध है। और दाईं तरफ जो मस्तिष्क है वहां सोच-विचार नहीं है; वहां भाव है, वहां अनुभूति है। वहां संगीत की चोट पड़ती है। वहां तर्क का कोई प्रभाव नहीं होता। वहां लयबद्धता पहुंचती है। वहां नृत्य पहुंच जाता है; सिद्धांत नहीं पहुंचते।

स्त्री दाएं तरफ के मस्तिष्क से जीती है; पुरुष बाएं तरफ के मस्तिष्क से जीता है। इसलिए स्त्री-पुरुष के बीच बात भी मुश्किल होती है; कोई मेल नहीं बैठता दिखता। पुरुष कुछ कहता है, स्त्री कुछ कहती है। पुरुष और ढंग से सोचता है, स्त्री और ढंग से सोचती है। उनके सोचने की प्रक्रियाएं अलग हैं। स्त्री विधिवत नहीं सोचती; सीधी छलांग लगाती है, निष्कर्षों पर पहुंच जाती है। पुरुष निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता, विधियों से गुजरता है--क्रमबद्ध, एक-एक कदम।

प्रेम में कोई विधि नहीं होती, विधान नहीं होता। प्रेम की क्या विधि और क्या विधान! हो जाता है बिजली की कौंध की तरह। हो गया तो हो गया। नहीं हुआ तो करने का कोई उपाय नहीं है।

पुरुषों ने भी भक्ति के गीत गाए हैं, लेकिन मीरा का कोई मुकाबला नहीं है; क्योंकि मीरा के लिए, स्त्री होने के कारण जो बिलकुल सहज है, वह पुरुष के लिए थोड़ा आरोपित सा मालूम पड़ता है।.... मीरा में जैसी सहज उदभावना हुई है भक्ति की, कहीं भी नहीं है। भक्त और भी हुए हैं, लेकिन सब मीरा से पीछे पड़ गए, पिछड़ गए। मीरा का तारा बहुत जगमगाता हुआ तारा है। आओ, इस तारे की तरफ चलें। अगर थोड़ी सी भी बूंदें तुम्हारे जीवन में बरस जाएं, मीरा के रस की, तो भी तुम्हारे रेगिस्तान में फूल खिल जाएंगे। अगर तुम्हारे हृदय में थोड़े से भी वैसे आंसू घुमड़ आएं, जैसे मीरा को घुमड़े, और तुम्हारे हृदय में थोड़े से राग बजने लगें, जैसा मीरा को बजा, थोड़ा सा सही! एक बूंद भी तुम्हें रंग जाएगी और नया कर जाएगी।"—ओशो
 

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