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फिर अमरित की बूंद पड़ी - पुस्तकें

 

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रु. 110.00
मोल  

फिर अमरित की बूंद पड़ी - Phir Amrit Ki Bund Pari

सामाजिक और राजनैतिक समस्याओं पर मनाली एवं मुंबई में प्रश्नोत्तर सहित ओशो द्वारा दिए गए पांच अमृत प्रवचनों का संकलन

"देश तो होते ही नहीं। देश तो झूठ हैं। राष्ट्र तो मनुष्य की ईजाद हैं। असलियत है व्यक्ति की। इस देश ने गौतम बुद्ध, उपनिषद के ऋषि, महावीर, आदिनाथ--आकाश की ऊंचाई से ऊंचाई छुई है। वह भी एक भारत है। वही पूरा भारत होना चाहिए।
और एक भारत और भी है। राजनीतिज्ञों का, चोरों का, कालाबाजारियों का। भारत के भीतर भारत है।
इसलिए यह सवाल नहीं है कि कौन देश श्रेष्ठ है और कौन देश अश्रेष्ठ है? सवाल यह है कि किस देश में अधिकतम श्रेष्ठ लोगों का निवास है और किस दिश में अधिकतम निकृष्ट लोगों का निवास है। भारत में दोनों मौजूद हैं।"—ओशो
पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:
  • ध्यान प्रक्रिया है रूपांतरण
  • मेरी दृष्टि सृजनात्मक है
  • मैं तुम्हें इक्कीसवीं सदी में ले जा सकता हूं
  • भारत: एक सनातन यात्रा
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    पुस्तकें - विवरण सामग्री तालिका
     
    OSHO Media International
    978-81-7261-252-8
        अनुक्रम
        प्रवचन 1 : ध्यान प्रक्रिया है रूपांतरण की
        प्रवचन 2 : एक नया ध्रुवतारा
        प्रवचन 3 : मेरी दृष्टि सृजनात्मक है
        प्रवचन 4 : मैं तुम्हें इक्कीसवीं सदी में ले जा सकता हूं
        प्रवचन 5 : भारत: एक सनातन यात्रा
     
     
    मूल्य सूची: रु. 90.00
     
    उद्धरण: फिर अमरित की बूंद पड़ी, पांचवां प्रवचन
    "कुछ मौलिक बातें भारत के मस्तिष्क में उतर जाएं तो केवल दस वर्षों के भीतर भारत दुनिया की विश्र्व शक्ति बन सकता है।

    पहली बात कि दरिद्रता में कोई अध्यात्म नहीं है। यह और बात है कि कोई समृद्ध व्यक्ति अपनी समृद्धि को लात मार कर भिखारी हो जाए, लेकिन उसके भिखारीपन में और एक साधारण भिखारी में जमीन-आसमान का अंतर है। उसका भिखारीपन समृद्धि के बाद की सीढ़ी है और साधारण भिखारी अभी समृद्धि तक ही नहीं पहुंचा, अभी समृद्धि के पार वाली सीढ़ी पर कैसे पहुंचेगा? भारत के मन में दरिद्रता के प्रति जो एक झूठा भाव पैदा हो गया है कि यह आध्यात्मिक है उसका कारण है; क्योंकि बुद्ध ने राज्य छोड़ दिया, महावीर ने राज्य छोड़ दिया। स्वाभाविक तर्क कहता है कि जब धन को छोड़ कर लोग चले गए, गरीब हो गए, नग्न हो गए, तो तुम तो बड़े सौभाग्यशाली हो, तुम नग्न ही हो, कहीं छोड़ कर जाने की जरूरत ही नहीं है। न राज्य छोड़ना है, न धन छोड़ना है। मगर तुम भूलते हो। बुद्ध के व्यक्तित्व में जो गरिमा दिखाई पड़ रही है, वह साम्राज्य को छोड़े बिना नहीं हो सकती थी। साम्राज्य का अनुभव एक विराट मुक्ति का अनुभव है, कि धन तुच्छ है, इससे कुछ पाया नहीं जा सकता।

    लेकिन इससे पूरे भारत ने एक गलत नतीजा ले लिया कि गरीब ही बने रहने में सार है। क्या फायदा है? सम्राट गरीब हो रहे हैं तो तुम्हारे गरीबी को छोड़ने से क्या फायदा है?

    भारत के मन से गरीबी का आदर मिटा देना जरूरी है।

    भारत में जनसंख्या को तीस वर्षों तक बिलकुल रोक देना जरूरी है।"—ओशो
     

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