सहज-योग - पुस्तकें

 

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सहज-योग – Sahaj Yog

सिद्ध सरहपा एवं तिलोपा की वाणी पर ओशो द्वारा प्रश्नोत्तर सहित दिए गए बीस अमृत प्रवचनों का संकलन।

सिद्धों का एक महान संदेश, ‘जागो’, ओशो की वाणी द्वारा इन प्रवचनों में और भी अधिक मुखरित हुआ है। ओशो कहते हैं—" जागो, मन जागरण की बेला! और जागरण की बेला हमेशा है। ऐसा कोई क्षण नहीं जब तुम जाग न सको। ऐसा कोई पल नहीं जब तुम पलक न खोल सको। आंख बंद किए हो यह तुम्हारा निर्णय है। आंख खोलना चाहो तो इसी क्षण क्रांति घट सकती है।"सिद्धों का एक महान संदेश, ‘जागो’, ओशो की वाणी द्वारा इन प्रवचनों में और भी अधिक मुखरित हुआ है।"

 
 
पुस्तकें - Details सामग्री तालिका
 
Rebel Publishing House, India
576
    अनुक्रम
    प्रवचन 1 : जागो, मन जागरण की बेला
    प्रवचन 2 : ओंकार : मूल और गंतव्य
    प्रवचन 3 : देह-गेह ईश्वर का
    प्रवचन 4 : सहज-योग और क्षण-बोध
    प्रवचन 5 : जगत—एक रूपक
    प्रवचन 6 : सहज-योग का आधार : साक्षी
    प्रवचन 7 : जीवन के मूल प्रश्न
    प्रवचन 8 : जीवन का शीर्षक : प्रेम
    प्रवचन 9 : फागुन पाहुन बन आया घर
    प्रवचन 10 : तरी खोल गाता चल माझी
    प्रवचन 11 : खोलो गृह के द्वार
    प्रवचन 12 : प्रेम : कितना मधुर, कितना मदिर
    प्रवचन 13 : प्रार्थना अर्थात संवेदना
    प्रवचन 14 : धरती बरसे अंबर भीजे
    प्रवचन 15 : प्रेम—समर्पण—स्वतंत्रता
    प्रवचन 16 : भोग में योग, योग में भोग
    प्रवचन 17 : भाई, आज बजी शहनाई
    प्रवचन 18 : हो गया हृदय का मौन मुखर
    प्रवचन 19 : प्रेम प्रार्थना है
    प्रवचन 20 : हे कमल, पंक से उठो, उठो
 
 
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उद्धरण: सहज-योग, पहला प्रवचन
"प्रकृति में पागलपन घटता ही नहीं। प्रकृति पागलपन को जानती नहीं। क्यों? अशांति ही नहीं है तो विक्षिप्तता कैसे होगी? अशांति नहीं है, क्योंकि समय ही नहीं है, तो अशांत कोई कैसे होगा?

इसे थोड़ा समझ लेना, तो ये सूत्र समझ में आने आसान हो जायेंगे।

अशांत होने के लिए समय चाहिए। अशांत होने के लिए अतीत का भाव चाहिए, भविष्य का भाव चाहिए। अतीत की याददाश्त चाहिए अशांत होने के लिए। वह जो दस साल पहले किसी ने गाली दी थी, वह अभी भी चुभनी चाहिए। गाली भी गई, देने वाले भी गये, समय भी गया, मगर तुम भीतर चुभाए बैठे हो। तुम उसे पकड़े बैठे हो। तुम उसे ढो रहे हो। वर्षों पहले की याददाश्तें तुम्हारे चित्त पर बोझिल होनी चाहिए तो तुम अशांत हो सकते हो। और भविष्य की कल्पना होनी चाहिए कि कल ऐसा करेंगे, परसों ऐसा करेंगे। योजनायें, कल्पनायें भविष्य की और स्मृतियां अतीत की--इन दोनों के बीच में ही पिसकर तुम पागल होओगे। इन दो चक्की के पाट के बीच जो फंस जाता है वह बच नहीं पाता।

और मजा यह है कि दोनों ही चक्की के पाट झूठे हैं। अतीत जा चुका, अब नहीं है और भविष्य अभी आया नहीं। सच्चा तो सिर्फ वर्तमान है। सच्चा तो यह क्षण है। नगद तो केवल यह क्षण है। इस क्षण में कैसी अशांति? जरा सोचो, गुनो! इस क्षण में कैसी अशांति? मत आने दो अतीत को, मत आने दो भविष्य को, फिर इस क्षण में तुम अशांति खोज सकोगे? चेष्टा भी करोगे तो अशांत न हो सकोगे। वर्तमान अशांति जानता ही नहीं।

अब यह बड़ा मजा है कि आदमी भविष्य की कल्पना करके अशांति खड़ी करता है और फिर भविष्य में ही शांत होने की योजना भी बनाता है। उससे अशांति और कई गुनी हो जाती है। और भविष्य को हम फैलाये चले जाते हैं। इस जन्म में ही हमारे भविष्य का विस्तार नहीं है, हम अगले जन्मों में भी फैलाते हैं। हमारी वासनायें इतनी हैं कि इस जन्म में भी पूरी नहीं होती, उनकी कल्पना अगले जन्म में होगी। और-और जन्म, और-और जन्म...आगे फैलाये चले जाते हैं। सारा बोझ तुम्हारी छाती पर पड़ता है। तुम टूट जाते हो। इसी बोझ के नीचे दबा हुआ आदमी अशांत होता है।"—ओशो
 

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