ग्रंथ
- also available as a ऑडियोपुस्तकें Series

समाधि कमल - पुस्तकें

 

Availability: In stock

रु. 120.00
मोल  

समाधि कमल - Samadhi Kamal

ध्यान से समाधि तक की संपूर्ण रूपरेखा पर ओशो द्वारा दिए गए पंद्रह अमृत प्रवचनों का संकलन।

"समाधि या आत्मा की उपलब्धि का रास्ता बिलकुल ही वैसा है जैसे बगीचे में माली पौधे बोता है—बीज बोता है, सम्हालता है, खाद देता है, पानी देता है, सूरज की रोशनी की व्यवस्था करता है, सुरक्षा करता है उनकी कि उन्हें जंगली जानवर न चर जाएं, उन पर बाड़ बिठाल देता है, बागुड़ लगा देता है। फिर रोज-रोज उनकी प्रतीक्षा करता है कि वे बढ़ें, लंबी प्रतीक्षा के बाद उनमें फूल आते हैं।

जीवन-साधना भी एक बगीचे में फूल लाने से भिन्न नहीं है। इसे भी बीज बोने होंगे, बीज ध्यान के बोने होंगे। खाद और पानी और सूरज की रोशनी भी देनी होगी। यूं समझ लें: एक सम्यक आचार की, जिसकी तीन बातें मैंने कहीं, उसकी खाद देनी होगी। सम्यक भाव की जो मैंने तीन बातें कहीं, उसका पानी देना होगा। और कल मैं तीन बातें आपसे सम्यक विचार की कहने को हूं, उनकी रोशनी देनी होगी।

तो इन त्रि-रत्नों के माध्यम से—सम्यक आचार और सम्यक भाव और सम्यक विचार के माध्यम से वे ध्यान के बीज समाधि के फूल तक पहुंचेंगे। तब, तब आपके भीतर कुछ जागेगा और उदय होगा। किसी प्रकाश, किसी सूर्य के दर्शन संभव होंगे।"—ओशो


 
 
पुस्तकें - विवरण सामग्री तालिका
 
OSHO Media International
152
978-81-7261-146-0
    अनुक्रम
    प्रवचन 1 : जीवन की सहज स्वीकृति
    प्रवचन 2 : अप्रमत्त जीवन—निराधार, निरालंब, निर्विचार
    प्रवचन 3 : सम्यक आहार, सम्यक व्यायाम, सम्यक निद्रा
    प्रवचन 4 : सबसे बड़ा चमत्कार—जल में कमलवत
    प्रवचन 5 : मैत्री भाव, आनंद भाव, समता भाव
    प्रवचन 6 : विचार के प्रति अपरिग्रह, तटस्थता और स्वतंत्र बोध
    प्रवचन 7 : साधना के जगत में प्रवेश
    प्रवचन 8 : आज का दिन अंतिम है
    प्रवचन 9 : ध्यान आंख के खुलने का उपाय है
    प्रवचन 10 : अज्ञान का बोध, रहस्य का बोध
    प्रवचन 11 : ध्यान—जागरण का द्वार
    प्रवचन 12 : शास्त्र, धर्म और मंदिर
    प्रवचन 13 : अभाव का बोध
    प्रवचन 14 : एकांत का मूल्य
    प्रवचन 15 : राजनीति से छुटकारा
 
 
मूल्य सूची: रु. 120.00
 
उद्धरण: समाधि कमल, आठवां प्रवचन
"मनुष्य के दो जन्म होते हैं। एक जन्म है; जो देह का है, जो मां-बाप देते हैं। उस देह के जन्म को; हम जीवन समझ लें; तो हम गलती में हैं। देह का जन्म जीवन नहीं है। एक दूसरा जन्म है; जो साधना से उपलब्ध होता है। और उस जन्म के माध्यम से हम आत्मिक सत्ता को, स्वसत्ता को अनुभव करते हैं। जीवन वहीं से प्रारंभ होता है।

लोग समझते हैं कि जन्म और मृत्यु के भीतर जीवन घिरा है। और मैं आपसे कहूं कि जन्म और मृत्यु के भीतर जीवन नहीं घिरा है। जो जीवन है; उसका न तो जन्म है और न उसकी मृत्यु है। जिसका जन्म होता है; उसकी मृत्यु निश्चित है। तो जीवन का न तो जन्म होता है और न मृत्यु होती है। जन्म और मृत्यु जीवन के नहीं हैं, देह के हैं।

देह बिलकुल भी जीवन नहीं है, देह बिलकुल मिट्टी है। उसके भीतर कोई जीवन है; जो उससे प्रकट हो रहा है और हमें धोखा दे रहा है कि देह जीवन है। जैसे इस बिजली के बल्ब से भीतर से प्रकाश निकल रहा है और हम धोखे में पड़ जाएं कि यह जो कांच का घेरा है; यह प्रकाश दे रहा है। यह कांच का घेरा बिलकुल प्रकाश नहीं दे रहा। प्रकाश भीतर है, यह कांच का घेरा केवल उसे पार आने दे रहा है, यह ट्रांसपैरेंट है। यह देह ट्रांसपैरेंट है; केवल जीवन के लिए, यह जीवन नहीं है। यह जीवन को बाहर आने देती है, यह पारदर्शी है। और इससे धोखा हो जाता है और लगता है यह जीवन है।

उस सत्य को, जो हमारे भीतर है, देह से भिन्न है, पृथक है, उसे जान लेने पर जीवन का अनुभव होता है। और जीवन का अनुभव होते ही जन्म और मृत्यु भ्रम हो जाते हैं, झूठे हो जाते हैं।"—ओशो
 

Email this page to your friend