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शून्य के पार  - पुस्तकें

 

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शून्य के पार - Shunya Ke Paar

कर्म, ज्ञान व भक्ति पर राजकोट में हुई प्रवचनमाला के अंतर्गत ओशो द्वारा दिए गए चार प्रवचन

"न तो ज्ञान ले जाएगा, न भक्ति ले जाएगी, न कर्म ले जाएगा। ज्ञान, भक्ति, कर्म तीनों मन के ही खेल हैं।
इन तीनों के पार जो जाएगा—वही अ-मन, नो-माइंड, वही आत्मा, वही परम सत्य उसकी अनुभूति में ले जाता है।
तब मुझसे मत पूछें कि मार्ग क्या है? सब मार्ग मन के हैं। मार्ग छोड़ें, क्योंकि मन छोड़ना है।
कर्म छोड़ें, वह मन की बाहरी परिधि है। विचार छोड़ें, वह मन की बीच की परिधि है। भाव छोड़ें, वह मन की आखिरी परिधि है। तीनों परिधियों को एक साथ छोड़ें। और उसे जान लें, जो तीनों के पार है, दि बियांड। वह जो सदा पीछे खड़ा है, पार खड़ा है, उसे जानते ही वह सब मिल जाता है, जो मिलने योग्य है। उसे जानते ही वह सब जान लिया जाता है, जो जानने योग्य है। उसे मिलने के बाद, मिलने को कुछ शेष नहीं रह जाता। उसे पाने के बाद, पाने को कुछ शेष नहीं रह जाता।"—ओशो
पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:
  • धर्म का कोई मार्ग नहीं है, कोई पंथ नहीं है

  • ज्ञान मार्ग नहीं है, ज्ञान एक भटकन है
  • भक्ति: भगवान का स्वप्न-सृजन
  • क्या है शुभ और क्या है अशुभ?

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    पुस्तकें - विवरण सामग्री तालिका
     
    OSHO Media International
    108
    978-81-7261-269-6
        अनुक्रम
        #1: कर्म, ज्ञान, भक्ति: मन के खेल
        #2: ज्ञान: मार्ग नहीं, भटकन है
        #3: भक्ति: भगवान का स्वप्न-सृजन
        #4: कर्म: सबसे बड़ा भ्रम
     
     
    मूल्य सूची: रु. 85.00
     
    उद्धरण: शून्य के पार, चौथा प्रवचन
    "सब शास्त्र जिसके लिए रोते हैं, चिल्लाते हैं! सब ज्ञानी जिसकी तरफ इशारे उठाते हैं और इशारे नहीं हो पाते हैं! सब शब्द जिसे कहते हैं और नहीं कह पाते हैं! सब आंखें जिसे तलाशती हैं और नहीं देख पाती हैं! और सब हाथ जिसको टटोलते हैं और नहीं पकड़ पाते हैं! वह इन तीनों के पार सदा मौजूद है। इन तीनों से जरा सा द्वार खुल जाए और वह उपलब्ध ही है।… इसलिए मार्ग में मत भटकें। सब मार्ग भटकाते हैं। सब मार्ग छोड़ दें। खड़े हो जाएं, एक सेकेंड को ही सिर्फ। खड़े होने का प्रयास करते रहें।

    भाव का, विचार का, कर्म का--तीनों के ऊपर उठने का प्रयास करते रहें, करते रहें, करते रहें। आपके करने से ऐसा नहीं होगा कि धीरे-धीरे आप उठते जाएंगे। न, करते रहें। नहीं उठेंगे, तब तक नहीं उठेंगे, लेकिन करते-करते, करते-करते कभी वह टर्निंग पॉइंट आ जाएगा कि तीनों चीजें एक सेकेंड को ठहर जाएंगी और आप अचानक पाएंगे कि आप उठ गए हैं।

    निन्यानबे डिग्री तक भी पानी भाप नहीं बनता। बस कुनकुना गर्म होता रहता है, गर्म होता रहता है, होता रहता है-- बस ठीक सौ डिग्री पर पहुंचा कि एक सेकेंड में सब बदल जाता है। पानी नदारत, पानी गया और भाप हो गई।

    ठीक ऐसे ही करते रहें, करते रहें। भाव के बाहर, विचार के बाहर, कर्म के बाहर--खोजते रहें, खोजते रहें। अनजान है वह क्षण, कब आ जाए। किसी भी दिन अचानक आप पाएंगे कि सौ डिग्री पूरी हो गई।… किसी को भी पता नहीं है कि कब किस आदमी की सौ डिग्री पूरी हो जाए? किस क्षण में? और जिस क्षण पूरी हो जाएगी, उसी क्षण आप खो जाएंगे। और जो हो जाएगा, वही सत्य है, वही परमात्मा है।

    मनुष्य परमात्मा से नहीं मिल पाता। पानी कभी भाप से मिल पाता है? पानी कैसे भाप से मिलेगा? पानी जब मिटेगा, तब भाप होगी। इसलिए पानी कभी भाप से नहीं मिलता।

    आदमी कभी परमात्मा से नहीं मिलता। आदमी तो भाप हो जाता है, मिट जाता है, तब जो रह जाता है, वह परमात्मा है।"—ओशो
     

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