गीता-दर्शन भाग  दो - पुस्तकें

 

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गीता-दर्शन भाग दो – Gita Darshan, Vol.2

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय चार ‘ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग’ एवं अध्याय पांच ‘कर्म-संन्यास-योग’ पर पुणे एवं क्रास मैदान, मुंबई में प्रश्नोत्तर सहित हुई प्रवचनमाला के अंतर्गत ओशो द्वारा दिए गए उनतीस प्रवचन

"कृष्ण कहते हैं: 'जब मनुष्य आसक्तिरहित होकर कर्म करता है, तो उसका जीवन यज्ञ हो जाता है'--पवित्र। उससे, मैं का जो पागलपन है, वह विदा हो जाता है। मेरे का विस्तार गिर जाता है। आसिक्त का जाल टूट जाता है। तादात्म्य का भाव खो जाता है। फिर वह व्यक्ति जैसा भी जीए, वह व्यक्ति जैसा भी चले, फिर वह व्यक्ति जो भी करे, उस करने, उस जीने, उस होने से कोई बंधन निर्मित नहीं होते हैं।"—ओशो
इस पुस्तक में गीता के चौथे व पांचवें अध्याय—ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग व कर्म-संन्यास-योग—तथा विविध प्रश्नों व विषयों पर चर्चा है।
कुछ विषय-बिंदु:


  • निष्काम कर्म का विज्ञान

  • जन्मों-जन्मों में कैसे निर्मित होता है मन

  • आत्म-ज्ञान के लिए सूत्र

  • काम-क्रोध से मुक्ति
  •  
     
    पुस्तकें - Details सामग्री तालिका
     
    OSHO Media International
    460
    978-81-7261-087-6
        अनुक्रम
        #1: सत्य एक, जानने वाले अनेक
        #2: भागवत चेतना का करुणावश अवतरण
        #3: दिव्य जीवन, समर्पित जीवन
        #4: परमात्मा के स्वर
        #5: जीवन एक लीला
        #6: वर्ण-व्यवस्था का मनोविज्ञान
        #7: कामना-शून्य चेतना
        #8: मैं मिटा, तो ब्रह्म
        #9: यज्ञ का रहस्य
        #10: संन्यास की नई अवधारणा
        #11: स्वाध्याय-यज्ञ की कीमिया
        #12: अंतर्वाणी-विद्या
        #13: मृत्यु का साक्षात
        #14: चरण-स्पर्श और गुरु-सेवा
        #15: मोह का टूटना
        #16: ज्ञान पवित्र करता है
        #17: इंद्रियजय और श्रद्धा
        #18: संशयात्मा विनश्यति
     
     
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    उद्धरण: गीता-दर्शन भाग दो, वर्ण-व्यवस्था का मनोविज्ञान

    "कर्म क्या है और अकर्म क्या है, बुद्धिमान व्यक्ति भी निर्णय नहीं कर पाते हैं। कृष्ण कहते हैं, वह गूढ़ तत्व मैं तुझसे कहूंगा, जिसे जानकर व्यक्ति मुक्त हो जाता है।

    अजीब-सी लगेगी यह बात; क्योंकि कर्म क्या है और अकर्म क्या है, यह तो मूढ़जन भी जानते हैं। कृष्ण कहते हैं, कर्म क्या है और अकर्म क्या है, यह बुद्धिमानजन भी नहीं जानते हैं।

    हम सभी को यह खयाल है कि हम जानते हैं, क्या है कर्म और क्या कर्म नहीं है। कर्म और अकर्म को हम सभी जानते हुए मालूम पड़ते हैं। लेकिन कृष्ण कहते हैं कि बुद्धिमानजन भी तय नहीं कर पाते हैं कि क्या कर्म है और क्या अकर्म है। गूढ़ है यह तत्व। तो फिर पुनर्विचार करना जरूरी है। हम जिसे कर्म समझते हैं, वह कर्म नहीं होगा; हम जिसे अकर्म समझते हैं, वह अकर्म नहीं होगा।

    हम किसे कर्म समझते हैं? हम प्रतिकर्म को कर्म समझे हुए हैं, रिएक्शन को एक्शन समझे हुए हैं। किसी ने गाली दी आपको, और आपने भी उत्तर में गाली दी। आप जो गाली दे रहे हैं, वह कर्म न हुआ; वह प्रतिकर्म हुआ, रिएक्शन हुआ। किसी ने प्रशंसा की, और आप मुस्कुराए, आनंदित हुए; वह आनंदित होना कर्म न हुआ; प्रतिकर्म हुआ, रिएक्शन हुआ।

    आपने कभी कोई कर्म किया है! या प्रतिकर्म ही किए हैं?

    चौबीस घंटे, जन्म से लेकर मृत्यु तक, हम प्रतिकर्म ही करते हैं; हम रिएक्ट ही करते हैं। हमारा सब करना हमारे भीतर से सहज-जात नहीं होता, स्पॉन्टेनियस नहीं होता। हमारा सब करना हमसे बाहर से उत्पादित होता है, बाहर से पैदा किया गया होता है।

    किसी ने धक्का दिया, तो क्रोध आ जाता है। किसी ने फूलमालाएं पहनाईं, तो अहंकार खड़ा हो जाता है। किसी ने गाली दी, तो गाली निकल आती है। किसी ने प्रेम के शब्द कहे, तो गदगद हो प्रेम बहने लगता है। लेकिन ये सब प्रतिकर्म हैं।

    ये प्रतिकर्म वैसे ही हैं, जैसे बटन दबाई और बिजली का बल्ब जल गया; बटन बुझाई और बिजली का बल्ब बुझ गया। बिजली का बल्ब भी सोचता होगा कि मैं कर्म करता हूं जलने का, बुझने का। लेकिन बिजली का बल्ब जलने-बुझने का कर्म नहीं करता है। कर्म उससे कराए जाते हैं। बटन दबती है, तो उसे जलना पड़ता है। बटन बुझती है, तो उसे बुझना पड़ता है। यह उसकी स्वेच्छा नहीं है।"—ओशो

     

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