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गीता-दर्शन  भाग चार - पुस्तकें

 

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रु. 300.00
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गीता-दर्शन भाग चार - Gita Darshan, Vol.4

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय आठ ‘अक्षर-ब्रह्म-योग’ एवं अध्याय नौ ‘राजविद्या-राजगुह्य-योग’ पर पुणे में तथा क्रास मैदान, मुंबई में हुई प्रवचनमाला के अंतर्गत ओशो द्वारा दिए गए चौबीस प्रवचन

"कृष्ण अर्जुन से उस क्षण, उस मार्ग, मृत्यु की उस कला की बात इन सूत्रों में करेंगे, जिस कला को जानने वाला, जिस मार्ग को पहचानने वाला, मर कर मरता नहीं, अमृत को उपलब्ध हो जाता है।"—ओशो


इस पुस्तक में गीता के आठवें व नौवें अध्याय—अक्षर-ब्रह्म-योग और राजविद्या-राजगुह्य-योग--तथा विविध प्रश्नों व विषयों पर चर्चा है।


कुछ विषय-बिंदु:


  • मृत्यु का भय क्यों?

  • योगयुक्त मरण के सूत्र

  • सृष्टि और प्रलय का वर्तुल

  • खोज की सम्यक दिशा

  • स्त्रैणता और पुरुषता का मनोविज्ञान
  •  
     
    पुस्तकें - विवरण सामग्री तालिका
     
    OSHO Media International
    392
    978-81-7261-125-5
        अनुक्रम
        #1: अध्याय-8
        स्वभाव अध्यात्म है
        मृत्यु-क्षण में हार्दिक प्रभु-स्मरण
        स्मरण की कला
        भाव और भक्ति
        योगयुक्त मरण के सूत्र
        वासना, समय और दुख
        सृष्टि और प्रलय का वर्तुल
        अक्षर ब्रह्म और अंतर्यात्रा
        जीवन उर्जा का ऊर्ध्वगमन- उत्तरायण पथ
        दक्षिणालय के जटिल भटकाव
        तत्वज्ञ-कर्मकांड के पार
        #2: अध्याय-9
        श्रद्धा का अंकुरण
        अतर्क्य रहस्य में प्रवेश
        जगत एक परिवार है
        विराट की अभीप्सा
        दैवी या आसुरी धारा
        ज्ञान, भक्ति, कर्म
        मैं ओंकार हूं
        जीवन के ऐक्य का बोध-अ-मन में
        वासना और उपासना
        खोज की सम्यक दिशा
        कर्ताभाव का अर्पण
        नीति और धर्म
        क्षणभंगुरता का बोध
     
     
    मूल्य सूची: रु. 300.00
     
    उद्धरण: गीता-दर्शन भाग चार, वासना और उपासना

    "आस्तिक की मेरी तरफ एक ही परिभाषा है, वह आदमी नहीं, जो कहता है, ईश्वर है। वह आदमी नहीं, जो कहता है कि ईश्वर है, इसके मैं प्रमाण दे सकता हूं। वह आदमी नहीं, जो ईश्वर है, ऐसी मान्यता रखकर जीता है। आस्तिक का एक ही अर्थ है, वह आदमी, जिसकी अस्तित्व के प्रति कोई शिकायत नहीं है। ईश्वर का नाम भी न ले, तो चलेगा। चर्चा ही न उठाए, तो भी चलेगा। ईश्वर की बात भी न करे, तो भी चलेगा। लेकिन अस्तित्व के प्रति, जीवन के प्रति उसकी कोई शिकायत नहीं है।

    यह सारा जीवन उसके लिए एक आनंद-उत्सव है। यह सारा जीवन उसके लिए एक अनुग्रह है, एक ग्रेटिट्यूड है। यह सारा जीवन एक अनुकंपा है, एक आभार है। उसके प्राण का एक-एक स्वर धन्यवाद से भरा है, जो भी है, उसके लिए। उसमें रत्तीभर फर्क की उसकी आकांक्षा नहीं है। ऐसा व्यक्ति, कृष्ण कहते हैं, निष्काम भाव से उपासता है मुझे। उसके योग-क्षेम की मैं स्वयं ही चिंता कर लेता हूं। उसे अपने न तो योग की चिंता करनी है और न क्षेम की।

    यहां एक बड़ी अदभुत बात है। और आमतौर से जब भी कोई इस सूत्र को पढ़ता है, तो उसको कठिनाई क्षेम में मालूम पड़ती है, योग में नहीं! इस सूत्र पर, जितने व्याख्याकार हैं, उनको कठिनाई क्षेम में मालूम पड़ती है। वे कहते हैं, योग तो ठीक है कि परमात्मा सम्हाल लेगा, अंतिम मिलन को; लेकिन यह जो रोज दैनंदिन का जीवन है, यह जो रोटी कमानी है, यह जो कपड़ा बनाना है, यह जो मकान बनाना है, यह जो बच्चे पालने हैं--यह सब--यह परमात्मा कैसे करेगा? हालत दूसरी होनी चाहिए। हालत तो यह होनी चाहिए कि ये छोटी-छोटी चीजें शायद परमात्मा कर भी लेगा। योग, साधना की अंतिम अवस्था, वह कैसे करेगा! लेकिन वह किसी को खयाल नहीं उठता।

    हम सबको डर इन्हीं सब छोटी चीजों का है, इसीलिए। उस बड़ी चीज पर तो हमारी कोई दृष्टि भी नहीं है।"—ओशो

     

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