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गीता-दर्शन भाग पांच - पुस्तकें

 

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गीता-दर्शन भाग पांच - Gita Darshan, Vol.5

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय दस ‘विभूति-योग’ एवं अध्याय ग्यारह ‘विश्वरूप-दर्शन-योग’ पर शिवाजी पार्क एवं क्रास मैदान, मुंबई में प्रश्नोत्तर सहित हुई प्रवचनमाला के अंतर्गत ओशो द्वारा दिए गए सत्ताइस प्रवचन

"अर्जुन को पता हो या न पता हो, ये कृष्ण के वचन जन्मों-जन्मों तक भी वह सुनता रहे, तो भी इनको सुनकर ही संतोष नहीं मिलेगा। इनके अनुकूल रूपांतरित होना पड़ेगा, इनके अनुकूल अर्जुन को बदलना पड़ेगा। और अगर इनके अनुकूल अर्जुन बदल जाए, तो अर्जुन स्वयं कृष्ण हो जाएगा। कृष्ण हो जाए, तो ही संतुष्ट हो सकेगा। उसके पहले कोई संतोष नहीं है। उसके पहले अतृप्ति बढ़ती चली जाएगी।
अगर कोई वचनों से ही तृप्त होना चाहे, तो कभी तृप्त न हो सकेगा। चलना पड़ेगा उस ओर, जिस ओर ये वचन इशारा करते हैं, इंगित करते हैं। जहां ये ले जाना चाहते हैं, वहां कोई पहुंचे तो तृप्ति होगी।"—ओशो
इस पुस्तक में गीता के दसवें व ग्यारहवें अध्याय--विभूति-योग व विश्वरूप-दर्शन-योग--तथा विविध प्रश्नों व विषयों पर चर्चा है।
कुछ विषय-बिंदु:
  • निश्चल ध्यानयोग क्या है?
  • कृष्ण द्वारा विभूतियां कहने का रहस्य
  • काम-ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन कैसे हो
  • साधना के चार चरण

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    पुस्तकें - विवरण सामग्री तालिका
     
    OSHO Media International
    476
    978-81-7261-128-6
        अनुक्रम
        #1: अध्याय-10
        अज्ञेय जीवन-रहस्य
        रूपांतरण का आधार-निष्कंप चित्त और जागरूकता
        ईश्वर अर्थात ऐश्वर्य
        ध्यान की छाया है समर्पण
        कृष्ण की भगवत्ता और डांवाडोल अर्जुन
        स्वभाव की पहचान
        शास्त्र इशारे हैं
        मृत्यु भी मैं हूं
        अभिजात्य का फूल
        शस्त्रधारियों में राम
        मैं शाश्वत समय हूं
        परम गोपनीय-मौन
        मंजिल है स्वयं में
        #2: अध्याय-11
        विराट से साक्षात की तैयारी
        दिव्य-चक्षु की पूर्व-भूमिका
        धर्म है आश्चर्य की खोज
        परमात्मा का भयावह रूप
        अचुनाव अतिक्रमण है
        पूरब और पश्चिम: नियति और पुरुषार्थ
        साधना के चार चरण
        बेशर्त स्वीकार
        चरण-स्पर्श का विज्ञान
        मनुष्य बीज है परमात्मा का
        मांग और प्रार्थना
        आंतरिक सौंदर्य
     
     
    मूल्य सूची: रु. 325.00
     
    उद्धरण: गीता-दर्शन भाग पांच, धर्म है आश्चर्य की खोज
    "आज तो विज्ञान भी स्वीकार करता है कि पदार्थ की जो आंतरिक घटना है, वह पदार्थ नहीं है, प्रकाश ही है। जहां-जहां हम पदार्थ देखते हैं, वह प्रकाश का घनीभूत रूप है, कंडेंस्ड लाइट। या उसको विद्युत कहें, या उसको प्रकाश की किरण कहें, या शक्ति कहें। लेकिन आज विज्ञान अनुभव करता है कि पदार्थ जैसी कोई भी चीज जगत में नहीं है। सिर्फ प्रकाश है। और प्रकाश ही जब घनीभूत हो जाता है, तो हमें पदार्थ मालूम पड़ता है।

    विज्ञान के विश्लेषण से पदार्थ का जो अंतिम रूप हमें उपलब्ध हुआ है, वह इलेक्ट्रान है, वह विद्युत-कण है। विद्युत-कण छोटा सूर्य है। अपने आप में पूरा, सूर्य की भांति प्रकाशोज्ज्वल। विज्ञान भी इस नतीजे पर पहुंचा है कि सारा जगत प्रकाश का खेल है।

    और धर्म तो इस नतीजे पर बहुत पहले से पहुंचा है कि परमात्मा का जो अनुभव है, वह वस्तुतः प्रकाश का अनुभव है। फिर कुरान कितनी ही भिन्न हो गीता से, और गीता कितनी ही भिन्न हो बाइबिल से, लेकिन एक मामले में जगत के सारे शास्त्र सहमत हैं, और वह है प्रकाश। सारे धर्म एक बात से सहमत हैं, और वह है, प्रकाश की परम अनुभूति।

    विज्ञान और धर्म दोनों एक नतीजे पर पहुंचे हैं, अलग-अलग रास्तों से। विज्ञान पहुंचा है पदार्थ को तोड़-तोड़कर इस नतीजे पर कि अंतिम कण, अविभाजनीय कण, प्रकाश है। और धर्म पहुंचा है स्वयं के भीतर डूबकर इस नतीजे पर कि जब कोई व्यक्ति अपनी पूरी गहराई में डूबता है, तो वहां भी प्रकाश है; और जब उस गहराई से बाहर देखता है, तो सब चीजें विलीन हो जाती हैं, सिर्फ प्रकाश रह जाता है।

    अगर यह सारा जगत प्रकाश रह जाए, तो निश्चित ही हजारों सूर्य एक साथ उत्पन्न हुए हों, ऐसा अनुभव होगा। हजार भी सिर्फ संख्या है। अनंत सूर्य! अनंत से भी हमें लगता है कि गिने जा सकेंगे, कुछ सीमा बनती है। नहीं, कोई सीमा नहीं बनेगी। अगर पृथ्वी का एक-एक कण एक-एक सूर्य हो जाए। और है। एक-एक कण सूर्य है। पदार्थ का एक-एक कण विद्युत ऊर्जा है।

    तो तब कोई गहन अनुभव में उतरता है अस्तित्व के, तो प्रकाश ही प्रकाश रह जाता है।

    संजय इसी तरफ धृतराष्ट्र को कह रहा है कि और हे राजन्‌! आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न हुआ जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्वरूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित ही होवे।"—ओशो
     

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